फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कोविड-19 के संक्रमण में मजबूरी का इलाज है प्लाज्मा थेरेपी है: डा. तूलिका चंद्रा

Thu, 30 Apr 2020 07:58 PM IST
Harendra Chaudhary शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • आईसीएमआर ने भी इसे स्टैंडर्ड केयर ऑफ ट्रीटमेंट नहीं माना है
  • बेहद गंभीर मामलों में ही किया जाता है इस थेरेपी से उपचार
  • थेरेपी से रिएक्शन होने की संभावना के साथ एलर्जिक रिएक्शन भी हो सकता है।
विज्ञापन
मरीज का उपचार करते डॉक्टर - फोटो : PTI (File)
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

दिल्ली में मैक्स अस्पताल ने कोविड-19 के संक्रमित को बचाने के लिए सबसे पहले प्लाज्मा थेरेपी का इस्तेमाल किया था। इसके बाद दिल्ली में तीन-चार मरीजों पर इसे प्रयोग में लाया गया। आईसीएमआर ने भी इसे स्टैंडर्ड केयर ऑफ ट्रीटमेंट (गारंटी का इलाज) नहीं माना है, लेकिन लखनऊ के केजीएमयू मेडिकल कालेज में एक मरीज की इससे जान बची है।

विज्ञापन


प्लाज्मा थेरेपी को प्रयोग में लाने का निर्णय लेने वाली डा. तूलिका चंद्रा ने बातचीत में बताया कि उनकी टीम के पास इसके सिवा कोई चारा ही नहीं था। डा. तूलिका का कहना है कि जब कोविड-19 से इलाज का कोई भी उपाय न बचा हो तब प्लाज्मा थेरेपी को मरीज की अनुमति लेकर अपनाया जा सकता है।

डा. चंद्रा के अनुसार प्लाज्मा थेरेपी से बचना ही बेहतर है। उन्होंने भी अभी कोविड-19 के केवल एक ही मरीज पर इसका प्रयोग किया है। आईसीएमआर ने भी कोविड-19 को ट्रायल के आधार सीमित रूप में दी जाने वाली थेरेपी बताया है।

आईसीएमआर से सहमत

डा. तूलिका चंद्रा का कहना है कि आईसीएमआर तकनीकी तौर पर सही है। प्लाज्मा थेरेपी कोविड-19 का गारंटी देने वाला इलाज नहीं है। हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन की दवा भी नहीं है, लेकिन शुरुआत में इसी का सहारा लिया जा रहा है।

विज्ञापन


डा. चंद्रा ने कहा कि वह खुद इसे हर कोविड-19 के मरीज पर अपनाने की सलाह नहीं दूंगी। चिकित्सा विज्ञान की भाषा में कहें तो यह केवल उन्हीं मरीजों के लिए है, जिन्हें बचा पाने का डॉक्टर के पास कोई और चारा न बचा हो।

इसे इस तरह से कह लीजिए कि किसी दूसरी दवा से कोई लाभ न हो रहा हो। डा. चंद्रा का कहना है कि दुनिया के कई देशों में इसी आधार पर इस थेरेपी का प्रयोग हुआ। यह बात अलग है कि अधिकांश में सफल रहा है।

क्या आया लखनऊ के मरीज में परिणाम?

उरई के 58 वर्षीय चिकित्सक कोविड-19 से संक्रमित थे। डा. तूलिका बताती हैं कि उनके फेफड़े में संक्रमण बहुत बढ़ चुका था। एंटीबॉडी के लक्षण नहीं आ रहे थे। एक्स-रे की रिपोर्ट काफी खराब थी। हमारे पास उन्हें बचाने का कोई चारा नहीं था।

तब हम चिकित्सकों की टीम ने परिजनों की अनुमति लेकर कनाडा से लौटी कोविड-19 संक्रमण से ठीक हो चुकी महिला डॉक्टर का प्लाज्मा लेकर प्लाज्मा थेरेपी (ट्रांसफ्यूजन) का निर्णय लिया।

इससे पहले संक्रमण से ठीक हुई महिला डॉक्टर का कोविड-19 एंटीबॉडी टेस्ट, हिपैटाइटिस बी, हिपैटाइटिस सी, सिफलिस, सीरम प्रोटीन, एचआईवी, मलेरिया टेस्ट किया गया। ब्लड ग्रुप का मिलान कराया गया।

इसके बाद थेरेपी के लिए आगे बढ़े। पांच दिन के बाद अब स्थिति बहुत अच्छी है। उरई के कोविड-19 से पीड़ित डॉक्टर के शरीर में एंटीबाडी बनने लगी, एक्स-रे रिपोर्ट अच्छी आई है। अब पूरी उम्मीद है कि वह जल्द कोविड-19 से ठीक हो जाएंगे।

वह बताती हैं कि फिलहाल वह अभी किसी और मरीज पर प्लाज्मा थिरैपी का इस्तेमाल के बारे में नहीं सोच रही हैं। 

प्लाज्मा थेरेपी से इसलिए बचते हैं

किसी का प्लाज्मा किसी पर क्यों ट्रांसफ्यूजन? डा. तूलिका चंद्रा भी कहती हैं कि चिकित्सक होने के नाते यह मन में पहला सवाल रहता है। इसलिए यह मजबूरी का इलाज है। वैसे भी कोविड-19 की कोई वैक्सीन नहीं आई है। कोई गारंटीयुक्त इलाज नहीं है।

वह बताती हैं कि प्लाज्मा थेरेपी जिसकी की जाती है, उसकी होम्योस्टैसिस में बदलाव का खतरा रहता है। रिएक्शन होने की संभावना रहती है। एलर्जिक रिएक्शन हो सकता है।

जिस व्यक्ति से प्लाज्मा लिया जाता है, उसके रक्त में मौजूद विकार का शिकार अगला व्यक्ति हो सकता है। यह चिंता सामान्य ब्लड चढ़ाने के समय भी बनी रहती है। इसलिए अभी किसी तरह का कोई उपाय न होने पर इसका प्रयोग किया जाता है।

विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें