डॉक्टर राममनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान की माइक्रोबॉयोलोजी विभाग की प्रमुख वैज्ञानिक डॉक्टर ज्योत्सना के मुताबिक अलग-अलग व्यक्तियों के रक्त में अलग-अलग प्रोटीन और कुछ अन्य बीमारियों से उत्पन्न एंटी-बॉडीज होते हैं।
इसका किसी दूसरे व्यक्ति पर नकारात्मक असर भी पड़ सकता है। यह दूसरे व्यक्ति के शरीर के किसी चीज से अलर्जिक होने की स्थिति पर निर्भर कर सकता है। इसी तरह के कुछ अन्य कारणों से प्लाज्मा तकनीकी बहुत कारगर साबित नहीं हो पाई है।
दरअसल, बहुचर्चित प्लाज्मा थेरेपी इलाज की बहुत पुरानी विधि है। इसे 1892 में डिप्थीरिया के इलाज के दौरान इस्तेमाल किया गया था। उस समय बीमारों के इलाज के लिए जानवरों के रक्त से प्लाज्मा निकाला जाता था।
समय-समय पर इसका अलग-अलग बीमारियों के इलाज के लिए प्रयोग किया गया है, लेकिन आज तक यह इलाज के लिए बहुत कारगर साबित नहीं हो पाई है।
चीन के वुहान में सबसे पहले मरीजों के इलाज के लिए डॉक्टरों ने प्लाज्मा विधि का इस्तेमाल किया। कथित तौर पर वहां इससे इलाज में काफी मदद मिली। इसके बाद इटली, साउथ कोरिया, कनाडा और अमेरिका में इसका इस्तेमाल किया गया है।
भारत में आईसीएमआर और स्वास्थ्य मंत्रालय ने कोरोना संक्रमित लोगों के इलाज के लिए अभी प्लाज्मा थेरेपी को मान्य विधि घोषित नहीं किया है। अभी प्रायोगिक तौर पर उत्तर प्रदेश, दिल्ली, पंजाब, मध्यप्रदेश, केरल, महाराष्ट्र जैसे कुछ प्रदेशों में इस्तेमाल की अनुमति दी गई है।
आईसीएमआर ने राज्यों से कहा है कि जो राज्य इसे परीक्षण के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं, वे इसके परिणाम उनसे साझा करें जिससे इस पर एक मान्य नियम बनाया जा सके।
दरअसल, किसी भी बीमारी से संक्रमित होने पर हमारे शरीर की श्वेत रक्त कणिकाएं उससे निपटने के लिए एंटी बॉडी तैयार करने लगती हैं। इसमें अलग-अलग मामलों में एक हफ्ते से लेकर लगभग एक महीने तक का समय लग सकता है।
यही कारण है कि संक्रमित व्यक्ति के अंदर लक्षण समाप्त होने के बाद भी अगर 14 दिन के पहले प्लाज्मा लिया जाता है तो इसमें एंटी बॉडी नहीं विकसित हुए हो सकते हैं। इसी कारण से कोविड संक्रमण की चेकिंग के लिए लिया गया एंटी बॉडी टेस्ट भी फेल हो सकता है।
रक्त के निर्माण में शरीर को लगभग 36 दिन का समय लगता है। यही कारण है कि डॉक्टर एक व्यक्ति को दो रक्तदान के बीच में लगभग तीन महीने का अंतर रखने की सलाह देते हैं। जबकि प्लाज्मा के मामले में ऐसा नहीं है। कोई व्यक्ति एक हफ्ते में दो बार प्लाज्मा का दान कर सकता है।
एक बार में 450 मिलीलीटर तक प्लाज्मा निकाला जा सकता है। प्लाज्मा निकालने और चढ़ाने में एक से डेढ़ घंटा का अलग-अलग समय लगता है। एक बीमार व्यक्ति के उपचार में 200 मिली से कुछ अधिक प्लाज्मा की आवश्यकता पड़ती है। प्लाज्मा शरीर में जाते ही बीमार व्यक्ति का शरीर भी एंटी बॉडी का निर्माण करने लगता है, जिससे बीमार व्यक्ति स्वस्थ होने लगता है।