खेती में बढ़ता कीटनाशकों का प्रयोग भारत सहित दुनियाभर में किसानों के स्वास्थ्य के लिए एक बड़ी समस्या बन चुका है। फसलों में छिड़का जाने वाला यह जहर कीटों को तो जरूर खत्म करता है, लेकिन इसके संपर्क में आने वाले पौधों, जानवरों और दूसरे जीवों पर यह प्रतिकूल असर डालता है। किसानों पर इसका असर धूम्रपान से होने वाले कैंसर के बराबर तक होता है।
अमेरिका के रॉकी विस्टा विश्वविद्यालय से जुड़े शोधकर्ताओं के नेतृत्व में किए इस अध्ययन के नतीजे जर्नल फ्रंटियर्स इन कैंसर कंट्रोल एंड सोसाइटी में प्रकाशित हुए हैं। अध्ययन में इस बात की पुष्टि की गई है कि कीटनाशकों के संपर्क में आने से तंत्रिका संबंधी रोगों के साथ-साथ प्रतिरक्षा प्रणाली में गिरावट और यहां तक की कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। इस शोध में शोधकर्ताओं ने 69 इस तरह के कीटनाशकों की पहचान की है जो कैंसर के बढ़ते मामलों से जुड़े हैं। इनमें से कई कीटनाशकों का उपयोग भारत में भी हो रहा है।
क्षेत्रों के अनुसार अलग-अलग जोखिम
अध्ययन में शोधकर्ताओं ने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ और सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल के आंकड़ों का उपयोग किया है। इसकी मदद से उन्होंने अमेरिका में 2015 से 2019 के बीच कैंसर की दरों का विश्लेषण किया है। इसमें पाया गया है कि विभिन्न क्षेत्रों में उगाई जाने वाली फसलों के अनुसार कैंसर का जोखिम अलग-अलग होता है। उदाहरण के लिए पश्चिमी अमेरिका के कुछ हिस्सों में ब्लैडर कैंसर, ल्यूकेमिया और गैर-हॉजकिन लिंफोमा की दर विशेष रूप से ऊंची थी। देखा जाए तो ऐसा अलग-अलग कृषि पद्धतियों की वजह से है। ये क्षेत्र आमतौर पर मध्य-पश्चिमी क्षेत्रों की तुलना में कहीं ज्यादा फल और सब्जियां पैदा करते हैं।
- उदाहरण के लिए कैलिफोर्निया देश का सबसे बड़ा सब्जी उत्पादक राज्य है, जहां 2017 में 12 लाख एकड़ क्षेत्र में सब्जियां उगाई गईं थीं। फ्लोरिडा में भी ऐसा ही पैटर्न देखने को मिलता है। अग्रणी हैं, कैंसर के उच्च जोखिम को दर्शाते हैं।
- इससे पता चलता है कि कैंसर का जोखिम प्रत्येक क्षेत्र में उगाई जाने वाली फसलों के प्रकार से जुड़ा हुआ है।
इसका खतरा अधिक
शोधकर्ताओं के अनुसार, कीटनाशकों के संपर्क में आने से नॉन-हॉजकिन लिंफोमा, ल्यूकेमिया और ब्लैडर कैंसर का खतरा धूम्रपान की तुलना में अधिक होता है।