शिशु आहार में चीनी पर संसदीय समिति की सख्ती
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उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने संसद में 'बेबी प्रोडक्ट्स और अन्य खाद्य उत्पादों में चीनी की मात्रा के विशेष संदर्भ में पैकेज्ड वस्तुओं के नियमन' पर अपनी रिपोर्ट पेश की। रिपोर्ट में कहा गया कि भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की सिफारिशों के आधार पर यह स्पष्ट है कि पैक्ड शिशु आहार के जरिए जरूरत से ज्यादा चीनी का सेवन बच्चों में आगे चलकर दांत खराब होने, मोटापा, मेटाबॉलिक विकार और दूसरी पुरानी बीमारियों का कारण बन सकता है। इसलिए सरकार को शिशु पोषण से जुड़े उत्पादों में चीनी की सीमा का समय-समय पर वैज्ञानिक आधार पर पुनर्मूल्यांकन करना चाहिए।
समिति ने सरकार को क्या-क्या बड़े सुझाव दिए?
- शिशु फॉर्मूला, अनाज आधारित पूरक आहार, फॉलो-अप फॉर्मूला और पारंपरिक पैक्ड शिशु आहार में चीनी की मात्रा तय पोषण मानकों के अनुरूप रखी जाए।
- शिशु आहार में चीनी की मात्रा पर कड़ी निगरानी रखी जाए।
- पोषण संबंधी दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाए।
- ऐसे शिशु खाद्य उत्पादों को बढ़ावा दिया जाए जिनमें अतिरिक्त चीनी बहुत कम हो या बिल्कुल न हो।
- जिन उत्पादों में अतिरिक्त चीनी मिलाई गई हो, उनके पैकेट के सामने इसकी स्पष्ट और प्रमुख जानकारी देना अनिवार्य किया जाए।
- लेबल पर प्रति सर्विंग अतिरिक्त चीनी की मात्रा (ग्राम में) लिखी जाए।
- लेबल पर यह भी बताया जाए कि अतिरिक्त चीनी लक्षित आयु वर्ग की दैनिक ऊर्जा आवश्यकता का कितना प्रतिशत है।
- जरूरत पड़ने पर संबंधित कानूनों, नियमों और विनियमों में संशोधन किया जाए।
WHO और ICMR की सिफारिशें क्या कहती हैं?
रिपोर्ट में कहा गया कि WHO वयस्कों और बच्चों दोनों के लिए कुल ऊर्जा सेवन का 10 प्रतिशत से कम मुक्त चीनी लेने की सलाह देता है। साथ ही यह भी कहा गया है कि यदि इसे 5 प्रतिशत से भी कम रखा जाए तो स्वास्थ्य को अतिरिक्त लाभ मिल सकता है। वहीं ICMR ने अपनी वर्ष 2024 की आहार संबंधी गाइडलाइन में प्रतिदिन 25 ग्राम से अधिक चीनी नहीं लेने की सलाह दी है। ICMR के अनुसार अतिरिक्त चीनी केवल कैलोरी देती है, लेकिन उसका कोई विशेष पोषण मूल्य नहीं होता। समिति ने कहा कि इन मानकों की जानकारी लोगों तक आसान भाषा में पहुंचाने के लिए 'ईट राइट' जैसे अभियानों को और प्रभावी बनाया जाए। इसके लिए स्कूलों, आंगनवाड़ी केंद्रों, मातृत्व क्लीनिकों और डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया जाए।
क्या जांच व्यवस्था में भी बदलाव की जरूरत बताई गई?
समिति ने कहा कि मौजूदा समय में शिशु पोषण से जुड़े चीनी के मानक अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हैं, लेकिन इस क्षेत्र में वैज्ञानिक जानकारी लगातार बदल रही है। इसलिए नियम भी समय के साथ अपडेट होने चाहिए। समिति ने सिफारिश की कि भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) के संबंधित वैज्ञानिक निकाय हर दो से तीन वर्ष के अंतराल पर शिशु फॉर्मूला, फॉलो-अप फॉर्मूला और पूरक आहार में चीनी की अनुमेय सीमा की वैज्ञानिक समीक्षा करें। साथ ही शिशु और बच्चों के खाद्य उत्पादों को जांच के मामले में प्राथमिकता दी जाए और हर साल होने वाली कुल जांच तथा सैंपलिंग में इस श्रेणी के लिए न्यूनतम तय हिस्सा सुरक्षित रखा जाए।
अभी कितनी जांच होती है और आगे क्या बदलाव सुझाए गए?
रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2024-25 में राज्य सरकारों और FSSAI के क्षेत्रीय कार्यालयों ने देशभर में चार लाख से अधिक निरीक्षण किए। इनमें शिशु आहार बनाने वाली इकाइयों से जुड़े करीब 1,100 निरीक्षण शामिल थे। जोखिम आधारित निरीक्षण प्रणाली (RBIS) के तहत शिशु आहार कारोबार को उच्च जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है। प्रत्येक खाद्य सुरक्षा अधिकारी के लिए हर महीने कम से कम 10 निरीक्षण और 25 नमूने लेने का लक्ष्य तय है। इसके बावजूद समिति ने कहा कि कुल निरीक्षणों की तुलना में शिशु आहार से जुड़े निरीक्षणों की संख्या काफी कम है, जबकि सबसे अधिक संवेदनशील उपभोक्ता यही वर्ग है। इसलिए FSSAI अपनी वार्षिक रिपोर्ट में शिशु और बच्चों के खाद्य उत्पादों से जुड़े निरीक्षण, जांचे गए नमूने, नियमों के उल्लंघन, विशेषकर चीनी से जुड़े उल्लंघन, की गई कार्रवाई और सुधारात्मक कदमों का अलग से पूरा विवरण प्रकाशित करे।