एक संसदीय समिति ने विदेश मंत्रालय को भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) के अधिकारियों की प्रोन्नति में अतिरिक्त आवश्यक योग्यता से जुड़े नियम शामिल किए जाने को असंवैधानिक करार दे दिया है। ये नियम वर्ष 2008 में कांग्रेस नेतृत्व वाली तत्कालीन यूपीए सरकार ने बनाए थे। समिति ने कहा कि संवैधनिक नियमों को मात्र कार्यकारी आदेशों के जरिए ‘ओवरराइड’ नहीं किया जा सकता।
हालांकि समिति ने सरकार को ये भी कहा है कि ग्रेड-4, ग्रेड-3 और ग्रेड-2 अधिकारियों को ऊपरी ग्रेड में प्रोन्नत करने के लिए किए इस संशोधित बेंचमार्क को तत्काल 1961 के नियम में आवश्यक संशोधन के जरिए शामिल किया जाए।
अधीनस्थ कानूनों की समिति (लोकसभा) के अध्यक्ष दिलीप कुमार मनसुखला गांधी ने मंगलवार को समिति की 28वीं रिपोर्ट पेश की। रिपोर्ट में कड़ी टिप्पणी की गई है कि 2008 में तत्कालीन विदेश सचिव शिवशंकर मेनन ने कार्यकारी आदेशों के जरिए प्रोन्नति के लिए बने आईएफएस (भर्ती, कैडर, वरिष्ठता और प्रोन्नति) नियम-1961 में दी गई आवश्यक योग्यता के अलावा अतिरिक्त आवश्यक योग्यता देखे जाने का नियम लागू कर दिया था, जो 1961 में बने कानून से अलग और इसके ऊपर होने की बात आदेश में कही गई थी।
अफसर नहीं मंत्रालय का अधिकार है पोस्टिंग
समिति ने तत्कालीन विदेश सचिव की तरफ से बदले नियम में दी गई योग्यता पर भी सवाल उठाया। मेनन ने ग्रेड-4 से ग्रेड-3 में प्रोन्नति के लिए दो साल विदेश में दूतावास के प्रथम सचिव या काउंसलर के तौर पर नियुक्त रहने और दो साल मंत्रालय में अंडर सचिव, उप सचिव या निदेशक पद पर नियुक्त रहने की अनिवार्यता तय की थी। समिति ने कहा कि आईएफएस अधिकारियों की पोस्टिंग मंत्रालय के प्रशासनिक अधिकार में आती है और पोस्टिंग का स्थान तय करना किसी अधिकारी के नियंत्रण से बाहर की बात है।