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मनमाने हवाई किरायों पर संसदीय समिति नाराज, सरकार के काबू में नहीं हैं किराए

Thu, 27 Dec 2018 03:35 AM IST
गौरव द्विवेदी शरद गुप्ता, अमर उजाला, नई दिल्ली
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सुरेश प्रभु
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नागरिक उड्डयन मंत्रालय से जुड़ी संसदीय समिति ने मनमाने हवाई किरायों पर लगाम लगाने संबंधी अपनी सिफ़ारिश को नज़रअंदाज़ किए जाने पर सख्त नाराजगी जताई है। समिति की दूसरी रिपोर्ट पिछले सप्ताह संसद के पटल पर रखी गई।

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समिति ने अपनी पहली रिपोर्ट इस साल के शुरुआत में संसद में पेश की थी जिसमें त्योहारों और महत्वपूर्ण दिनों पर हवाई किरायों को दस गुना तक बढाने पर आपत्ति जताते हुए सरकार से इस पर काबू करने की सिफ़ारिश की थी। तृणमूल कांग्रेस सांसद डेरेक ओ’ब्रायन की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति का मानना था कि सरकार को हर रूट के लिए अधिकतम किराए की सीमा निर्धारित करनी चाहिए क्योंकि विमानन कंपनियों को मनमाना लाभ कमाने की छूट नही दी जा सकती। सरकार को आम नागरिकों के प्रति अपनी जवाबदेही के तहत हवाई यात्रियों को शोषण से बचाना चाहिए।

समिति ने निजी कंपनियों द्वारा सामान, खाने और सीट बुक करने जैसी निशुल्क सुविधाओं पर ऊंचे दामों पर बेचने पर भी आपत्ति की थी। समिति ने एयर टरबाइन फ्यूल (एटीएफ) के दाम घटने का फायदा हवाई यात्रियों को न दिए जाने पर नाराजगी जताई थी।
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सरकार को संसदीय समिति की रिपोर्ट पर क्या कार्रवाई की गई, यह समिति को बताना होता है। लेकिन इस मामले में अधिकतर सिफ़ारिशों के जवाब में 29 अगस्त को भेजी गई एक्शन टेकन रिपोर्ट (एटीआर) में नागरिक उड्डयन  बस ‘ड्यूली नोटेड’  (संज्ञान ले लिया गया है) लिख कर भेज दिया। सरकार का कहना था कि 1994 के एयर कारपोरेशन एक्ट के खत्म हो जाने के बाद अब हवाई किराए निर्धारित करने में उसकी बहुत सीमित भूमिका रह गई है। वह न तो इन्हें काबू कर सकता है और न ही इनका अनुमोदन। 

हवाई कंपनियां वैसे भी यात्रा से 90 दिन या 60 दिन पहले बुकिंग करने वालों से रियायती किराया ही वसूल रही हैं। इसी तरह 2013 के एयर ट्रांस्पोर्ट सरकुलर के जरिए भोजन, सामान और सीट चुनने जैसी सभी सुविधाएं किराए से अलग कर दी गई थीं। अब सरकार इसमें कोई दख़ल नहीं दे सकती।

सामाजिक उत्तरदायित्व का वास्ता

संसदीय समिति ने सरकार को उसके सामाजिक उत्तरदायित्व की याद दिलाते हुए कहा कि यदि हवाई ईंधन पर ड्यूटी कम होता है तो उसका लाभ यात्रियों को क्यों नहीं मिलना चाहिए। उसका कहना था कि उपभोक्ताओं के हितों का संरक्षण करना सरकार की ज़िम्मेदारी है। यदि खराब व्यवहार करने वाले यात्रियों का नाम ‘नो फ़्लाई लिस्ट’ में डाल दिया जाता है तो यात्रियों के साथ दुर्व्यवहार करने वाले कर्मियों पर भी सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।

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