सांसदों का निलंबन सुर्खियों में है। हालांकि, ऐसा पहली बार नहीं हुआ। 1989 में राजीव गांधी की सरकार के समय एक साथ 63 लोकसभा सांसद निलंबित किए गए थे। निलंबन के बाद देश की राजनीति में बड़े बदलाव हुए। 34 साल पहले संसद की सख्त कार्रवाई से जुड़े तथ्य जानिए
संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान विपक्षी सांसदों के निलंबन का सिलसिला जारी है। मंगलवार को एक बार फिर 49 लोकसभा सांसदों को शेष सत्र से निलंबित कर दिया गया। इस सत्र में अब तक 141 सांसद निलंबित हो चुके हैं। इनमें 95 लोकसभा के और 46 राज्यसभा के सदस्य हैं। भारत के संसदीय इतिहास में ये अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई है। बीते सात दशक में इस तरह की सबसे बड़ी कार्रवाई 1989 में हुई थी। हालांकि, उस वक्त भी निलंबित किए गए सांसदों की कुल संख्या मौजूदा संख्या की आधी भी नहीं थी।
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1989 में संसद की कार्यवाही के दौरान क्यों बड़ी संख्या में सांसदों को निलंबित किया गया? उस दौर में सरकार के पास कितना संख्या बल था? विपक्ष के किन सांसदों को निलंबन का सामना करना पड़ा था? विपक्षी सांसदों पर हुई कार्रवाई के बाद विपक्ष ने क्या कदम उठाया था? सांसदों पर हुई कार्रवाई के बाद हुए लोकसभा चुनावों में नतीजे कैसे रहे थे? आइए जानते हैं...
34 साल पहले हुई कार्रवाई पर आज भी चर्चा
पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी (फाइल)
- फोटो : Istock
मार्च 1989 की बात है। उस वक्त कांग्रेस की सरकार थी। राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री थे। अक्तूबर, 1984 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की नृशंस हत्या के बाद हुए चुनाव हुए तो कांग्रेस 414 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई। सरकार बनने के चंद वर्षों के बाद ही विवाद राजीव सरकार का पीछा करने लगे।
दरअसल, मार्च 1986 में भारत और स्वीडन के बीच बोफोर्स तोप सौदा हुआ। हॉवित्जर तोप की सप्लाई के लिए हुआ यह सौदा घोटाले के आरोपों से घिर गया। एक तरफ राजनीतिक दल भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाते हैं तो दूसरी तरफ सियासी समीक्षक बोफोर्स के मामले में अंग्रेज इतिहासकार लॉर्ड एक्टन के कथन का जिक्र करते हैं। लॉर्ड ने कहा था कि ताकत बढ़ने पर नैतिकता घटने लगती है। उनके कथन- (Absolute Power Corrupts Absolutely) की आज भी चर्चा होती है।
कांग्रेस को 543 सीटों में 414 सीटों पर जीत; क्या सत्ता का नशा हावी हुआ?
राजीव गांधी और विश्वनाथ प्रताप सिंह (फाइल फोटो)
- फोटो : अमर उजाला
1989 आते-आते विपक्ष राजीव सरकार के खिलाफ एकजुट हो चुका था। विपक्षी एकजुटता में बड़ी भूमिका निभाई कभी राजीव के ही करीबी रहे विश्वनाथ प्रताप सिंह ने। चुनावी साल में विपक्षी दलों के आक्रामक तेवरों से घिरी कांग्रेस पर 'लोकतंत्र विरोधी' और विपक्ष की आवाज दबाने के गंभीर आरोप लगे। मार्च 1989 में संसद का बजट सत्र चल रहा था। राजीव गांधी के नेतृत्व वाले कांग्रेस शासन के दौरान इंदिरा गांधी हत्याकांड की जांच के लिए जस्टिस ठक्कर आयोग का गठन किया गया था। जांच के बाद 15 मार्च, 1989 को जस्टिस एमपी ठक्कर के नेतृत्व वाले जांच आयोग की रिपोर्ट पेश किए जाने के दौरान लोकसभा में जबरदस्त हंगामा हुआ। कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक विरोध और हंगामे का प्रमुख कारण ठक्कर आयोग की रिपोर्ट के अलावा बोफोर्स तोप घोटाला भी था।
एक दिन बाद ही रद्द हो गया था निलंबन
1989 में लोकसभा स्पीकर रहे बलराम जाखड़
- फोटो : लोकसभा वेबसाइट
विपक्ष के कुल 63 सांसदों को तीन दिन के लिए निलंबित किया गया। तत्कालीन संसदीय कार्य मंत्री एचकेएल भगत ने सांसदों के निलंबन का प्रस्ताव पेश किया। विपक्षी दल- तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी), जनता पार्टी और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) सहित अन्य दलों के कुल 63 सांसदों का निलंबन हुआ। हालांकि, बाद में निलंबित सांसदों ने अशोभनीय आचरण के लिए उस समय के लोकसभा स्पीकर बलराम जाखड़ से माफी मांगी। इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष ने एक दिन बाद ही सांसदों का निलंबन रद्द कर दिया।
निलंबन की प्रक्रिया कैसे पूरी हुई?
संसद भवन
- फोटो : सोशल मीडिया
लोकसभा की कार्यवाही से जुड़े दस्तावेजों को खंगालने पर पता लगता है कि 15 मार्च के दिन दोपहर तीन बजकर तीन मिनट पर निलंबन का प्रस्ताव पेश किया गया। इस समय स्पीकर बलराम जाखड़ खुद आसन पर मौजूद नहीं थे। पूरी प्रक्रिया उपसभापति के पीठासीन रहते पूरी की गई। हंगामे और शोरशराबे के बीच अशोभनीय आचरण का प्रमाण भी मिलता है। निलंबन का प्रस्ताव पारित होने के बाद एचकेएल भगत ने शाम करीब 04.01 बजे आरिफ मोहम्मद खान पर आरोप लगाया कि उन्होंने महिला मंत्री शीला दीक्षित से सदन के भीतर अभद्र बर्ताव किया। उनके हाथ से दस्तावेज छीने गए। पूरे सदन ने इस बर्ताव की निंदा की थी। इसके बाद सदन में सांसदों के निलंबन की कार्रवाई हुई।
इन सांसदों को किया गया था निलंबित
सी. माधव रेड्डी
वी. शोभनाद्रेश्वर राव
ई. अय्यपु रेड्डी
बेजवाड़ा पापी रेड्डी
श्रीहरि राव
एनपी झांसी लक्ष्मी
डॉ. टी. कल्पना देवी
जी. भूपति
एम. रघुमा रेड्डी
माणिक रेड्डी
ए.जे.वी.बी. महेश्वर राव
पी. अप्पलानारासिम्हम
सी. संबू
डॉ. जी. विजया रामा राव
एच.ए. डोरा
बासुदेब आचार्य
अजीत कुमार साहा
बाजू बान रियान
हन्नान मोल्ला
विभा घोष गोस्वामी
सैयद मसूदल हुसैन
ज़ैनल आबेदीन
अजॉय विश्वास
सत्यगोपाल मिश्रा
डॉ. सुधीर रॉय
अनिल बसु
मतिलाल हांसदा
पूर्ण चंद्र मलिक
एस जयपाल रेड्डी
वीएस कृष्णा लायर
राम बहादुर सिंह
थम्पन थॉमस
विजय कुमार मिश्रा
इंद्रजीत गुप्ता
गीता मुखर्जी
विजय कुमार यादव
रामाश्रय प्रसाद सिंह
दिनेश गोस्वामी
भद्रेश्वर तांती
मुहीराम सैकिया
पलास बर्मन
सनत कुमार मंडल
चरणजीत सिंह वालिया
एस. तरलोचन सिंह तूर
सी. जंगा रेड्डी
डॉ. ए.के. पटेल
अमर रॉय प्रधान
चित्त महता
डॉ. ए. कलानिधि,
बलवंत सिंह रामूवालिया
डी.बी. पाटिल
आरिफ मोहम्मद खान
राज कुमार राय
राम धन
राम पूजन पटेल
वी.सी. शुक्ला
मानवेंद्र सिंह
विश्वनाथ प्रताप सिंह समेत कुल 63 सांसद निलंबित किए गए थे।
सांसदों के निलंबन के बाद पूरे समूचे विपक्ष के सासंदों ने संसद सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। हालांकि, चंद महीने बाद ही आम चुनाव होने थे। ऐसे में इन सीटों पर उप चुनाव नहीं हुए। साल के अंत में हुए आम चुनाव में पांच साल पहले प्रचंड बहुमत से सत्ता में आई कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। पार्टी महज 197 सीटों पर सिमट गई। सबसे बड़ा दल होने के बाद भी कांग्रेस सत्ता से दूर रह गई। 143 सीटें जीतने वाली जनता दल के विश्वनाथ प्रताप सिंह देश के नए प्रधानमंत्री बने थे। जनता दल को भाजपा और वाम दलों ने बाहर से समर्थन दिया।