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ऐसी भी है मजबूरी, बच्ची को पत्थर से बांधकर काम करती है ये मां

Wed, 18 May 2016 04:13 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली
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बच्चे को पत्थर से बांधकर काम करने जाती है मां - फोटो : Reuters
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अहमदाबाद में एक कंस्ट्रक्शन साइट के पास एक ऐसी बच्ची दिखी, जिसके पैरों में प्लास्टिक की पट्टी बंधी थी। इस प्लास्टिक की पट्टी का एक हिस्सा बच्ची के पैर में बंधा था और दूसरा हिस्सा पत्थर से बंधा हुआ था। 15 महीने की यह बच्ची शिवानी रोजाना करीब 9 घंटे तक इसी तरह से बंधी रहती है। भले ही बच्ची पेड़ की छांव में रहती है, लेकिन इस समय वहां का पारा 40 डिग्री से ऊपर ही रहता है, जिसके थपेड़े इस मासूम बच्ची को भी झेलने पड़ते हैं।
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जब बच्ची की मां सरता कालरा से इस बारे में बात की गई तो उसने बताया कि बच्चे को बांधने के अलावा उसके पास और कोई रास्ता नहीं है। उसका बेटा महज साढ़े तीन साल का है, इसलिए वह बच्ची को नहीं संभाल पाता है। बच्ची की मां ने कहा कि कंस्ट्रक्शन साइट पर बहुत भीड़-भाड़ होती है और काम होता रहता है। ऐसे में बच्ची खेलते-खेलते किसी हादसे का शिकार न हो जाए, इसलिए उसे बांधना पड़ता है।

बच्ची की मां और पिता रोजाना 250 रुपए की दिहाड़ी पर काम करते हैं। देश भर में करीब 4 करोड़ मजदूर कंस्ट्रक्शन साइट पर काम करते हैं, जिनमें से हर पांच में से एक मजदूर महिला है। इन मजदूरों में से अधिकर गरीब हैं, जो खुले में टेंट लगाकर रहते हैं। ये लोग ईंट ढोने, गड्ढा खोदने और लग्जरी घर बनाने का काम करते हैं।
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सिर्फ काम से मतलब रखते हैं मैनेजर

मैनेजर को नहीं आती है बच्चों पर दया - फोटो : Reuters
सेव द चिल्ड्रन इंडिया के बाल सुरक्षा प्रमुख प्रभात झा ने कहा कि क्रेच (बच्चों का ख्याल रखने वाली जगह) बहुत ही कम हैं और इन पर पैसे खर्च होते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी हर जगह पर या तो सरकारी या फिर कंस्ट्रक्शन साइट की तरफ से क्रेच की सुविधा मुहैया कराई जानी चाहिए, क्योंकि ऐसी जगहों पर बच्चों को नुकसान होने का बहुत अधिक खतरा रहता है।

मां को थोड़ी-थोड़ी देर में काम रोककर बच्चों को दूध पिलाने आना पड़ता है। ये बच्चे करीब 7 साल का होने तक मां-बाप के साथ रहते हैं और फिर उसके बाद उन्हें गांव में रह रहे उनके दादा-दादी या नाना-नानी के पास भेज दिया जाता है। कालरा कहती हैं कि बच्ची को प्लास्टिक से बंधा देखकर भी मैनेजर को दया नहीं आती है। मैनेजर को हमारे बच्चों की कोई चिंता नहीं है, बल्कि उन्हें सिर्फ काम होने से मतलब होता है।
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