गतवर्ष अप्रैल में सरकार ने कच्चे पॉम तेल (सीपीओ) पर शुल्क को 30 फीसदी से बढ़ाकर 44 फीसदी किया था, जबकि आरबीडी (रिफाइंड किस्म) के आयात शुल्क को 40 फीसदी से बढ़ाकर 54 फीसदी किया गया था। इस माह सरकार ने रिफाइंड पॉम ऑयल का आयात मलयेशिया से किए जाने पर शुल्क 54 फीसदी से घटाकर 45 फीसदी कर दिया था। वहीं इंडोनेशिया समेत आसियान देशों से आयात होने पर 50 फीसदी का शुल्क तय किया गया है। लेकिन दोनों ही देश आयात शुल्क में और कमी लाने की मांग कर रहे हैं, जिस पर चीनी निर्यात की बुनियाद टिकी है।
अच्छी फसल के बावजूद पेराई में हुई देरी
गन्ना किसानों का भारी बकाया सरकार के लिए किसी बड़ी मुसीबत से कम नहीं है। इसकी वजह आने वाले कुछ माह में लोकसभा चुनाव हैं, जिसके मद्देनजर सरकार निर्यात के साथ अन्य पहलुओं पर भी काम कर रही है। मौजूदा समय चीनी मिलों पर गन्ना किसानों का बकाया 19,000 करोड़ रुपये का पहुंच चुका है। गन्ना बकाया में लगभग 5,000 करोड़ रुपये पिछले साल जुड़े हैं, शेष 14,000 करोड़ रुपये का बकाया चालू सीजन के 6 सप्ताह से भी कम समय का है। इस साल भी गन्ने की फसल अच्छी हुई है, जिसके बावजूद चीनी मिलों ने पेराई सत्र (अक्तूबर 2018-सितंबर 2019) के लिए नवंबर, 2018 में अपना परिचालन शुरू किया है।
शुल्क कटौती हमारे पक्ष में
मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, दोनों देशों से विदेश मंत्रालय और उसकी संयुक्त चर्चा चल रही है। हाल ही में उनकी मांग को ध्यान में रखकर की गई शुल्क कटौती हमारे पक्ष में है। सरकार को आशा है कि दोनों देश जल्द मान जाएंगे और बड़े पैमाने पर चीनी का निर्यात होने से चीनी मिलों समेत किसानों को बड़ी राहत मिलेगी। गौरतलब है कि सरकार ने हाल ही में चीनी निर्यात की संभावनाएं तलाशने के लिए अधिकारियों की कई टीमों को चीन, बांग्लादेश, श्रीलंका, इंडोनेशिया और मलयेशिया भेजा था। दक्षिण एशियाई दोनों देशों के इतर भी पड़ोसी देशों से बातचीत जारी है। उल्लेखनीय है कि चीन को पहले भी भारत चीनी निर्यात कर चुका है।