दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने रविवार को पाकिस्तानी उच्चायोग के वीजा सेक्शन के जिन दो अफसरों को जासूसी के आरोप में रंगे हाथ गिरफ्तार किया था, उन्हें सोमवार रात को पाकिस्तान के हवाले कर दिया गया।
जांच एजेंसियों के सूत्र बताते हैं कि पाकिस्तानी उच्चायोग में केवल ये दो ही जासूसी नहीं कर रहे थे, बल्कि वहां पर ऐसे अधिकारियों की लंबी फेहरिस्त है। देर-सवेर वे भी जांच एजेंसियों के हाथ लग सकते हैं।
दरअसल, ये आईएसआई एजेंट हैं। किसी को इन पर शक न हो और उच्चायोग का सुरक्षा कवच इन्हें मिलता रहे, इसलिए इन्हें यहां तैनात किया जाता है। उच्चायोग में बैठकर ये लोग आसानी से स्लीपर सेल बना सकते हैं।
किसी से मिलना जुलना हो तो उसके लिए भी इन्हें कोई दिक्कत नहीं आती। उच्चायोग की गाड़ी को वैसे भी कोई रोकता नहीं है। वे देश के दूसरे हिस्से में भी आ जा सकते हैं।
कश्मीर में मौजूद पाकिस्तान के आतंकी संगठनों को कौन कहां से और किसके जरिए मदद पहुंचा रहा है, भारतीय जांच एजेंसियों ने इसका पता लगा लिया है।
एनआईए और ईडी के अनुसार, आतंकियों के हमदर्द बने पाकिस्तानी उच्चायोग के कई अधिकारी और कर्मचारी रडार पर हैं।
एनआईए अपनी चार्जशीट में कह चुकी है कि पाकिस्तानी उच्चायोग से आतंकियों को धन एवं दूसरी मदद पहुंचाई जा रही है। सूत्र बताते हैं कि उच्चायोग में बैठे आईएसआई के गुर्गे पहले अलगाववादियों और कथित सामाजिक संगठनों से संपर्क करते हैं।
आतंकियों को धन एवं दूसरी मदद पहुंचाने का यह पहला पड़ाव है। ये संगठन अपने सामाजिक कार्यों की आड़ में आईएसआई के मंसूबों को पूरा करने में मदद करते हैं।
दुबई और दूसरे देशों में बैठे आईएसआई के एजेंट कश्मीर में आतंकियों के लिए धन भेजते हैं। चूंकि यह आर्थिक मदद सीधे तौर पर अलगाववादियों या कश्मीर के संगठनों तक भेजना थोड़ा मुश्किल काम होता है।
ऐसे में उन्हें कई तरह की जांच का सामना करना पड़ सकता है। जब वही मदद पाकिस्तानी उच्चायोग से आती है तो राह आसान बन जाती है।
सुरक्षा एजेंसियों को शक न हो, इसलिए आतंकी संगठन पाकिस्तानी उच्चायोग की मदद लेते हैं। कश्मीर में बैठे आतंकियों के मददगार उच्चायोग से वह राशि आसानी से रिलीज करा लेते हैं।
एनआईए और ईडी, आतंकियों के ऐसे कई मददगारों का खुलासा कर चुकी है।
आतंकी फंडिंग मामले में प्रवर्तन निदेशालय ने हिज्बुल मुजाहिदीन के सरगना सैयद सलाउद्दीन की जम्मू-कश्मीर में डेढ़ दर्जन संपत्तियों को जब्त किया है। सलाउद्दीन पाकिस्तान के रावलपिंडी में रहता है।
ईडी ने सलाउद्दीन, अहमद शाह वटाली और कई दूसरे लोगों के खिलाफ गैर-कानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत दायर किए गए आरोप पत्र पर संज्ञान लेने के बाद धनशोधन का आपराधिक मामला दर्ज किया था।
जांच में मालूम हुआ कि आतंकवादी हाफ़िज सईद के लिए कैशियर का काम कर रहे अहमद शाह वटाली जो कि कश्मीर में व्यवसाय करते थे, वे हुर्रियत एवं दूसरे अलगाववादी संगठनों की मदद से आतंकियों व पत्थरबाजों को धन मुहैया कराते रहे हैं।
एनआईए ने पिछले साल 26 फरवरी को कई अलगाववादी नेताओं के ठिकानों पर छापे मारे थे। इनमें जेकेएलएफ चेयरमैन यासीन मलिक, जम्मू-कश्मीर डेमोक्रेटिक फ्रीडम पार्टी के अध्यक्ष शब्बीर शाह, अवामी एक्शन कमेटी के चेयरमैन मीरवायज उमर फारुख, तहरीक-ए-हुर्रियत के चेयरमैन मोहम्मद अशरफ खान, एपीएचसी के महासचिव मशरत आलम, जेकेएसएम के चेयरमैन जफर अकबर भट्ट और सैयद अली गिलानी के पुत्र नसीम गिलानी शामिल हैं।
इनके कब्जे से कई अहम दस्तावेज, जिनमें प्रॉपर्टी पेपर, बैंक स्टेटमेंट व रुपयों के लेन-देन से संबंधित अन्य कागजात आदि बरामद किए गए थे। लेपटॉप, ई-टेबलेट, मोबाइल फोन, पेनड्राइव और डीवीआर सिस्टम भी मिले थे।
इन नेताओं के घर-दफ़्तरों से कई आतंकवादी संगठनों के लैटर हैड और पाकिस्तान के शिक्षण संस्थानों में दाखिले के लिए वीजा फार्म भी बरामद किए गए। इतना ही नहीं, मीरवायज उमर फारुख के निवास से हाईटेक इंटरनेट संचार उपकरण जांच एजेंसी के हाथ लगे थे।
जांच एजेंसियां नए आतंकवाद-विरोधी कानून के तहत आतंकी संगठनों की संपत्तियां जब्त कर रही हैं। जब यह कानून नहीं बना था, तो इसके लिए जांच अधिकारी को संबंधित राज्य के डीजीपी की पूर्व अनुमति लेनी पड़ती थी।
अब एनआईए का कोई अफसर ऐसे मामले की जांच कर रहा है, तो आरोपी की संपत्ति को जब्त करने के लिए उसे संबंधित राज्य के डीजीपी की मंजूरी की जरूरत नहीं होगी।
इसके लिए केवल एनआईए के महानिदेशक की मंजूरी ही काफी रहेगी। केंद्र सरकार के इस बिल के जरिए आतंकियों के मददगारों को यह संदेश दे दिया गया है कि अब उनका बचना मुश्किल है; वे बहुत जल्द कानूनी शिकंजे में आ सकते हैं।