पाकिस्तान ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लिए बैटरी से चलने वाली और चारों तरफ से खुली कार का इंतजाम किया है। हालांकि यह पूर्व पीएम को भारत में मिली जेड प्लस श्रेणी के सुरक्षा इंतजामों के बराबर नहीं है। ऐसे में भारत ने पाक को अतिरिक्त सुरक्षा इंतजाम करने के लिए कहा है। साथ ही भारत जत्थे में शामिल लोगों के लिए सुरक्षा के विशेष बंदोबस्त के लिए भी कहा है।
यही नहीं भारत ने सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लेने के लिए अपनी एक टीम को पाकिस्तान में दाखिल होने देने की इजाजत भी मांगी है। हालांकि पाक ने अभी तक इसका कोई जवाब नहीं दिया है। साथ ही पाक ने पूरे कार्यकम्रों का ब्योरा भी नहीं दिया है।
भारतीय जत्थे के करतारपुर जाने को लेकर सवाल खड़ा हो गया है कि जताई गई आशंकाओं के बाद भी पाकिस्तान सहयोगात्मक रवैया नहीं दिखाता है तो क्या भारतीय जत्था अपने जोखिम पर करतारपुर जाएगा। क्योंकि जत्थे में केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी, हरसिमरत कौर बादल, शिरोमणि अकाली दल के नेता सुखबीर सिंह बादल और 150 सांसद भी शामिल हैं।
सूत्रों ने बताया कि पाकिस्तान में सिख्स फॉर जस्टिस जैसे खालिस्तानी समूहों और लश्कर ए तैयबा जैसे आतंकी संगठनों के कारण भारत सरकार अपने पहले जत्थे की सुरक्षा को लेकर चिंतित है। बता दें कि भारत के सौ दूतावासों ने गुरु नानक जयंती पर कई आयोजन कराए हैं। करीब 90 देशों के प्रतिनिधियों को भारत भी बुलाया गया है।
भारत से पाकिस्तान के करतारपुर जाने वाले श्रद्धालु बिना बायोमेट्रिक पहचान के वापस नहीं लौट सकेंगे। इसके लिए भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने पूरी व्यवस्था भी की है, ताकि जो यात्री जा रहे हैं, सिर्फ वही भारत लौटकर आएं। यहां तक कि पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह भी इसी प्रक्रिया से गुजरेंगे।
बता दें कि हाल ही में इमरान खान ने एक ट्वीट कर कहा था कि करतारपुर जाने के लिए किसी पासपोर्ट की जरूरत नहीं होगी, सिर्फ वैध पहचान पत्र ही काफी रहेगा, लेकिन दोनों देशों के बीच हुए समझौते के अनुसार पासपोर्ट जरूरी है। ऐसे में केंद्र सरकार ने पाकिस्तान से इस संबंध में स्थिति स्पष्ट करने को कहा है। वहीं सुरक्षा एजेंसियां पासपोर्ट से छूट देने को आतंकियों की घुसपैठ में मदद के नजरिए से भी देख रही हैं।
सूत्रों के हवाले से दी गई मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, करतारपुर गलियारे को पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने नहीं, बल्कि वहां की सेना ने खुलवाया है। इसके पीछे उसका मकसद भारत में अलगाववाद को बढ़ावा देना है। गलियारे को लेकर 1999 में कवायद शुरू हुई थी, लेकिन पाकिस्तान पूरी तरह सहमत नहीं था। हालांकि अगस्त 2018 में इमरान खान के प्रधानमंत्री बनने पर मंजूरी दे दी गई।