बलूचिस्तान पर दिए गए भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान के खिलाफ प्रदर्शनों को पाकिस्तानी उर्दू मीडिया में बहुत तवज्जो दी गई है। 'जंग' ने संपादकीय लिखा है- मोदी को बलूचिस्तान का जवाब। अखबार कहता है कि प्रांतीय राजधानी क्वेटा समेत सभी छोटे बडे शहरों में लोग सडकों पर निकले और जुबान पर 'मोदी का जो यार है, गद्दार है गद्दार है' और 'बलूचिस्तान में भारतीय दखल नामंजूर' जैसे नारे थे। अखबार ने बलूचिस्तान के मुख्यमंत्री सनाउल्लाह जहरी के इस बयान को भी अहमियत दी है कि मुट्ठी भर लोग चंद टकों की खातिर भारत को सलाम कर रहे हैं।
मोदी की तारीफ करने वाले बलोच अलगाववादी नेता बराहमदाग बुगती को गद्दार बताते हुए 'नवा-ए-वक्त' कहता है कि वो जिस सूबे की नुमाइंदगी का दावा कर रहे हैं, वहां कदम रखने की भी जुर्रत नहीं कर सकते। अखबार के मुताबिक बलूचिस्तान पर बयान देकर मोदी ने रेड लाइन पार की है तो इसका जबाव सरकार की तरफ से आना चाहिए और खासकर प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को मोदी को फोन कर नाराजगी जतानी चाहिए।
'जसारत' लिखता है कि ये प्रदर्शन मोदी के इस दावे का जवाब है कि बलूचिस्तान का मुद्दा उठाने के लिए उनका आभार जताया है। अखबार कहता है कि मोदी ने भारत प्रशासित कश्मीर की तुलना बलूचिस्तान और गिलगित से करके ऐसी हिमाकत की है कि भारत में भी उनकी आलोचना हो रही है।
'दुनिया' लिखता है कि ये प्रदर्शन इस बात का सबूत हैं कि बलूचिस्तान के लोगों का दिल पाकिस्तान के साथ धडकता है और वो इससे अलग होने के बारे में सोच भी नहीं सकते हैं। लेकिन अखबार ये भी कहता है कि अगर ये प्रदर्शन सिर्फ बलूचिस्तान ही नहीं, बल्कि बाकी तीन प्रांतों में भी होते तो इनका और ज्यादा असर होता।
अखबार के मुताबिक फिर 'मोदी एंड कंपनी' को ये संदेश मिलता कि अन्य तीन प्रांतों को बलूचिस्तान इस कदर अजीज है कि वो अपने भाइयों को कभी अलग नहीं होने देंगे। उधर रोजानामा 'इंसाफ' ने पाकिस्तान की तरफ से भारत को कश्मीर के मुद्दे पर वार्ता के न्योते पर संपादकीय लिखा है- बातचीत का बेमकसद खेल बंद होना चाहिए।