एससीओ की बैठक से पहले पाकिस्तान ने भारत के प्रधानमंत्री से बिश्केक में द्विपक्षीय वार्ता की इच्छा जताई। प्रधानमंत्री इमरान खान ने खुद पत्र लिखा। इससे पहले भारत ने प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में पाकिस्तान को आने का न्योता नहीं भेजा, केवल बिम्सटेक के सदस्य देश के शिखर नेता आमंत्रित किए गए।
एससीओ से ठीक एक सप्ताह पहले भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त रह चुके और वहां के वर्तमान विदेश सचिव सोहेल महमूद भारत की निजी यात्रा पर आए। कूटनीति के जानकारों का कहना है कि एक विदेश सचिव का इस तरह से आना चौंकाता है।
इसके बाद भारत ने प्रधानमंत्री के बिश्केक जाने के लिए पाकिस्तान के हवाई मार्ग की इजाजत मांगी। इजाजत मिल भी गई, लेकिन प्रधानमंत्री ने मध्य एशिया से होकर बिश्केक जाने के लंबे रास्ते को चुना। प्रधानमंत्री के वार्ता, भेंट मुलाकात कार्यक्रम में कहीं पाकिस्तान का नामोनिशान नहीं था।
यह एक कूटनीतिक संदेश था कि भारत सीमा पार का आतंकवाद और पाकिस्तान के साथ शांति वार्ता दोनों एक साथ सहन नहीं कर सकता। प्रधानमंत्री मोदी ने बिना पाकिस्तान का नाम लिए आतंकवाद का मुद्दा भी उठाया और दमदारी से अपनी बात रखी। इस दौरान पाकिस्तान लगातार शांति वार्ता प्रक्रिया या बातचीत शुरू करने का संदेश देता रहा।
यह कूटनीति में होता है। जहां राजनीति के सारे दरवाजे बंद हो जाते हैं, वहां कूटनीति की खिड़की से ताजी हवा आने की उम्मीद बनी रहती है। बिश्केक में हाथ मिलाने खबर आना भी इसी का हिस्सा है। प्रधानमंत्री मोदी और प्रधानमंत्री इमरान खान इसी खिड़की का इस्तेमाल का करके एक दूसरे को बधाई देते रहे हैं।
विदेश मंत्रालय के अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि सब कुछ एक साथ खत्म नहीं किया जा सकता। मंत्रालय अपना काम करता रहता है। राजनीति भी चलती रहती है। मंत्रालय में कभी पाकिस्तान डेस्क पर काफी सक्रिय रहे सूत्र की मानें तो कई बार जो दिखाई दे रहा है, वह होता नहीं है। होता कुछ और है।
सूत्र का कहना है कि भारत हमेशा शांति, स्थायित्व और समृद्ध पाकिस्तान चाहता है। इसमें पाकिस्तान से ज्यादा भारत का हित है। वहां की स्थायी सरकार के साथ न केवल बातचीत हो सकेगी, बल्कि सबकुछ ठीकठाक चल सकेगा। इसलिए संवाद का रास्ता कभी पूरी तरह से बंद नहीं किया जा सकता।
राजनयिक सूत्रों का कहना कि पाकिस्तान के साथ शांति वार्ता और आतंकवाद दोनों एक साथ नहीं चल सकती। हमारे इस रुख से पाकिस्तान को कई बार अवगत कराया जा चुका है। इस लिए जब पाकिस्तान अपनी जमीन से चल रहे आतंकी संगठनों के खिलाफ ठोस कार्रवाई नहीं करता, दोनों देशों के बीच में शांतिपूर्ण, प्रगाढ़ रिश्तों की प्रक्रिया थोड़ी मुश्किल है। सूत्रों का कहना है कि यह गेंद पाकिस्तान के पाले में है।