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'हैवान ने हमें तबाह कर दिया, अब तो हर दस्तक से लगता है डर'

Fri, 29 Jul 2016 04:14 AM IST
रोहित अग्रवाल/अमर उजाला, मेरठ
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दरिंदगी की शिकार 13 साल की किशोरी के मां बनने की दुख भरी दास्तां दिल को दहलाने वाली है। अपने साथ जमाने भर का दर्द समेटे इस परिवार को हर कदम शर्मिंदगी झेलनी पड़ी। मजदूरी कर दो वक्त की रोटी जुटाने वाला पिता मोटे ब्याज के कर्ज में फंस गया है। हर मोड़ पर परिस्थितियां इस कदर विपरीत हैं कि कहीं किनारा नहीं मिल रहा है।
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अमर उजाला की टीम बृहस्पतिवार दोपहर पीड़ित परिवार के मकान पर पहुंची। दरवाजे पर दस्तक दी तो अंदर आवाज आई कौन है? परिचय देने पर पीड़िता के पिता ने तसल्ली करने के बाद दरवाजा खोला। घर में सन्नाटा था। परिवार के सभी सदस्य परदे के पीछे एक कमरे में थे। परिवार का हाल पूछते ही पिता की आंखों में आंसू आ गए। वह बोले- हम तो बर्बाद हो गए। 55 साल के उस हैवान ने हमें तो तबाह ही कर दिया। इज्जत भी गई, घर भी गया।

अब दुनिया से मुंह छिपाते फिर रहे हैं। इस बस्ती में अभी तक उनके अतीत के बारे में किसी को नहीं पता था। लेकिन, बेटी के मां बनने के बाद पूरे परिवार के मन में अजीब सी दहशत है। हर वक्त घर के दरवाजे बंद कर कैदियों की तरह रह रहे हैं। दरवाजे पर किसी की दस्तक होते ही अजीब सा खौफ छा जाता है। इस वजह से उन्होंने इस बस्ती का पता भी अपने कुछ ही रिश्तेदारों को दे रखा है।
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पुलिस ने भी मोड़ लिया था मुंह

पीड़ित किशोरी के पिता ने नम आंखों से बताया कि हम तो हर कदम पर बेइज्जत हुए। बेटी को लेकर इलाज से डिलीवरी कराने तक जब भी अस्पताल पहुंचे, सबसे पहले यही पूछा जाता कि किशोरी का पति कौन है। हमारे पास इसका जवाब नहीं होता था तो कई अस्पतालों ने इलाज और डिलीवरी से ही मना कर दिया। सरकारी अस्पताल में गए तो उन्होंने भी पति का नाम पूछा। पूरी जानकारी दी तो डॉक्टरों ने इसे पुलिस केस बताकर पुलिस लाने को कहा।

वह पुलिस चौकी पहुंचे तो पुलिस वालों ने कह दिया कि उन्हें और भी काम हैं। परेशान होकर वह एक नेता के पास गए। उनकी सिफारिश पर बेटी को अस्पताल में भर्ती किया गया। इतनी जलालत सहने के बाद बेटी मां बनी। लेकिन, लोकलाज के डर से परिजनों ने नवजात को मां के साथ रखने के बजाय अपने रिश्तेदार को दे दिया। गम में डूबे परिवार के लोग यह कहकर सब्र कर लेते हैं कि शायद कुदरत को यही मंजूर है।

कर्ज में फंसे, पढ़ाई भी छूटी
दिहाड़ी पर मजदूरी कर घर का चूल्हा जलता था। मुसीबतों का पहाड़ टूटा तो चार महीने से पिता घर में बैठा है। तीन बेटियां और तीन बेटे हैं। जो थोड़ी बहुत जमा पूंजी थी, वह भी बेटी के इलाज और अन्य खर्चों में खत्म हो गई। अब कर्जदार बन गए। बदनामी से डरकर बच्चों का स्कूल भी छूट चुका है। कुछ रिश्तेदार और समाज के लोग हमदर्दी में मदद तो कर रहे हैं। कुछ दिन पहले ही मोटे ब्याज पर 35 हजार रुपये उठाए थे। पता नहीं किस्मत और कैसे दिन दिखाएगी।
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