फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

प्राणवायु का संकट: टैंकरों की कमी से हुई देश में ऑक्सीजन की किल्लत, सालभर में सड़क पर आ पाता है ट्रक

Sat, 24 Apr 2021 06:51 PM IST
Harendra Chaudhary राहुल संपाल, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस के महासचिव नवीन कुमार गुप्ता के मुताबिक ऑक्सीजन टैंकर को बनाने में तकरीबन आठ माह लगते हैं। बाकि ट्रांसपोर्ट विभाग की प्रक्रिया से गुजरने में दो माह लगते हैं। ऐसे में एक टैंकर को सड़क पर आने में 10 से 12 माह तक लग जाते हैं।
विज्ञापन
ऑक्सीजन टैंकर - फोटो : अमर उजाला (फाइल)
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

कोरोना की दूसरी लहर के कारण देशभर में हाहाकार मचा हुआ है। ऑक्सीजन की कमी से रोज हजारों मरीज दम तोड़ रहे हैं। अस्पतालों में ऑक्सीजन टैंकरों के जरिए प्राणवायु सप्लाई की जा रही है। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि देश में अब तक ऑक्सीजन सप्लाई महज 500 टैंकरों के ही भरोसे थी। जैसे ही अस्पतालों में स्थिति बिगड़ी तो नाइट्रोजन और आर्गन गैस के टैंकरों को ऑक्सीजन टैंकरों में तब्दील किया गया। ताबड़तोड चालकों को इन टैंकर को चलाने का प्रशिक्षण दिया गया ताकि ऑक्सीजन की कमी के संकट को दूर किया जा सके।

विज्ञापन

माइनस 150 डिग्री पर लिक्विड ऑक्सीजन लेकर जाता है टैंकर

ट्रांसपोर्ट क्षेत्र की सबसे बड़ी यूनियन ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस के महासचिव नवीन कुमार गुप्ता ने अमर उजाला को बताया कि देश में बढ़ती ऑक्सीजन की मांग को देखते हुए नाइट्रोजन और आर्गन गैस के टैंकरों को ऑक्सीजन टैंकरों में बदला गया है ताकि ऑक्सीजन की कमी के इस संकट को कम किया जा सके। ऐसे में अब करीब एक हजार ऑक्सीजन टैंकर ही सड़कों पर दौड़ रहे हैं। उनका कहना है कि एक टैंकर को चलाने में औसतन 74 रुपये प्रति किलोमीटर का खर्च आ रहा है।

गुप्ता बताते हैं कि ऑक्सीजन सप्लाई करने वाले टैंकर बेहद महंगे होते हैं। इन्हें बनाने में करीब 72 लाख रुपये की लागत आती है। ये क्रायोजेनिक टैंकर माइनस 150 डिग्री पर लिक्विड ऑक्सीजन लेकर जाते हैं। देश में चुनिंदा निर्माता ही इन टैंकरों को डिमांड के आधार पर बनाते हैं। ऑक्सीजन टैंकर को बनाने में तकरीबन आठ माह लगते हैं। बाकि ट्रांसपोर्ट विभाग की प्रक्रिया से गुजरने में दो माह लगते हैं। ऐसे में एक टैंकर को सड़क पर आने में 10 से 12 माह तक लग जाते हैं। इन टैंकर को चलाने वाले ड्राइवरों को भी विशेष ट्रेनिंग दी जाती है। उन्हें पता होना चाहिए कि किस प्रेशर पर ऑक्सीजन को ले जाना है।
विज्ञापन

ड्राइवरों को 15 दिन का विशेष प्रशिक्षण

उन्होंने आगे बताया कि ऑक्सीजन मैन्युफैक्चरर इस लिक्विड ऑक्सीजन को बड़े-बड़े टैंकरों में स्टोर करते हैं। जहां से बेहद ठंडे रहने वाले क्रायोजेनिक टैंकरों से डिस्ट्रीब्यूटर तक भेजते हैं। डिस्ट्रीब्यूटर इसका प्रेशर कम करके गैस के रूप में अलग-अलग तरह के सिलेंडरों में इसे भरते हैं। यही सिलेंडर सीधे अस्पतालों में या इससे छोटे सप्लायरों तक पहुंचाए जाते हैं। वह बताते हैं कि एक ऑक्सीजन टैंकर औसतन 45 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से चलता है। वहीं जब एक टैंकर जब ऑक्सीजन लेकर चलता है तो तकरीबन 34 रुपये प्रति किलोमीटर का खर्चा आता है। वहीं जब टैंकर खाली लौटता है तो ये खर्च बढ़कर औसतन 70 से 74 रुपये प्रति किलोमीटर हो जाता है, ऐसा इसकी रनिंग कॉ़स्ट बढ़ने से होता है।

एआईएमटीसी के वेस्ट जोन के उपाध्यक्ष विजय कालरा ने अमर उजाला को बताया, पहले करीब 500 टैंकर थे जो ऑक्सीजन की आपूर्ति करते थे, लेकिन अब इनकी संख्या बढ़ा दी गई हैं। अब एक हजार से ज्यादा ट्रक चलाए जा रहे हैं। इसमें मेडिकल नाइट्रोजन टैंकर, ट्रकों को भी ऑक्सीजन की आपूर्ति के लिए लगाया गया है। ये टैंकर अन्य की तुलना में बिल्कुल अलग होते है। ऑक्सीजन टैंकर ट्रक ड्राइवरों को 15 दिन का विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है, इसके बाद ही वे इन ट्रकों को चला सकते हैं। सामान्य ट्रकों के मुकाबले इन ट्रक में आग लगने की आशंका ज्यादा होती है, इसलिए ये ट्रक धीमी गति से भी चलते हैं।

उन्होंने बताया कि देश में कई जगह ऑक्सीजन के प्लांट हैं। भिलाई, राउरकेला, बोकारो, विशाखापट्टनम, जामनगर से ऑक्सीजन सप्लाई की जा रही है। इन जगह से उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, दिल्ली, छत्तीसगढ़, राजस्थान और महाराष्ट्र मे सप्लाई हो रही है। ऑक्सीजन टैंकरों को चलने में करीब 65 फीसदी डीजल की लागत होती है। वहीं 15 फीसदी सामान्य टोल सहित अन्य खर्चे होते हैं।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें