देह और अंगदान को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार ने देश के सभी अस्पतालों में ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर तैनात करने का फैसला लिया है। राज्यों को जारी आदेश में केंद्र ने निजी मेडिकल कॉलेजों से भी इस पर संज्ञान लेने के लिए कहा है। जिन अस्पतालों में प्रत्यारोपण किए जा रहे हैं, वहां स्थायी तौर पर ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर की नियुक्ति अनिवार्य है।
केंद्र की ओर से राष्ट्रीय अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (नोट्टो) ने जारी आदेश में कहा है कि राष्ट्रीय अंग प्रत्यारोपण कार्यक्रम के तहत सरकारी मेडिकल कॉलेजों में दो और निजी में एक ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर की नियुक्ति को मंजूरी दी गई। केंद्र ने साल 2020 से 2025 के बीच इन नियुक्ति में सहयोग का निर्णय भी लिया है, लेकिन बीते चार साल में ज्यादातर अस्पतालों ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया है। नोट्टो के निदेशक डॉ. अनिल कुमार ने सभी राज्यों को अगले एक वर्ष के भीतर सरकारी अस्पतालों में इन पदों पर स्थायी भर्ती करने का समय दिया है।
50 से ज्यादा कोऑर्डिनेटर तैयार
दरअसल, ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर एक स्वास्थ्य सेवा पेशेवर होता है, जो अंगदान और प्रत्यारोपण से जुड़े कामों का प्रबंधन करता है। ये डॉक्टर, नर्स, या स्वास्थ्य विज्ञान में स्नातक हो सकते हैं। पिछले कुछ वर्षों में नोट्टो ने अलग अलग प्रशिक्षण कार्यक्रम के जरिये करीब 50 से ज्यादा कोऑर्डिनेटर तैयार भी किए हैं। इनका काम संभावित अंगदाताओं की पहचान करने के साथ-साथ मस्तिष्क मृत्यु से लेकर अंग दान की पूरी प्रक्रिया का प्रबंधन करना है।
गैर कानूनी काम में आएगी कमी
नोट्टो का मानना है कि स्थायी तौर पर कोऑर्डिनेटर की नियुक्ति के बाद अंगदान को लेकर गैरकानूनी काम में कमी आ सकती है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि अभी तक जितने भी किडनी कांड या अन्य अंगों से जुड़े आपराधिक मामले सामने आए हैं उनमें सबसे कॉमन कोऑर्डिनेटर है जो अस्थायी तौर पर कार्यरत रहे। इस कार्य प्रोफाइल के चलते अपनी जिम्मेदारियों के प्रति इनकी गंभीरता सवालों के घेरे में रहती है।
डॉक्टरों के लिए कम पड़ रही देह
राज्यों को लिखे एक अन्य पत्र में केंद्र सरकार के स्वास्थ्य महानिदेशक डॉ. अतुल गोयल ने कहा है कि मेडिकल कॉलेजों में डॉक्टरों के प्रशिक्षण के लिए दान में मिली देह का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन पिछले कुछ समय से ज्यादातर कॉलेजों में देह पर्याप्त संख्या में उपलब्ध नहीं है। इसके चलते भविष्य में एक बड़ा संकट भी पैदा हो सकता है। इसलिए प्रत्येक मेडिकल कॉलेज में देह या फिर अंगदान को बढ़ावा देने के लिए जागरूकता कार्यक्रमों की एक शृंखला शुरू करना जरूरी है।