सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को साफ किया कि देशभर की अदालतों और ट्रिब्यूनल में अदालत कक्षों के भीतर सीसीटीवी कैमरे लगाने के आदेश का मकसद कार्यवाही की रिकार्डिंग करना नहीं था। न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल और न्यायमूर्ति यूयू ललित की पीठ ने कहा, ‘हमने अदालत कक्षों के भीतर सीसीटीवी कैमरे लगाने का आदेश सुरक्षा और न्यायिक प्रशासन को ध्यान में रखते हुए दिया था।
अदालती कार्यवाही अदालत कक्ष में मौजूद सभी लोगों के लिए खुली है लेकिन यह उन लोगों के लिए खुली नहीं हो सकती, जो कोर्ट रूम में मौजूद न हो।’ मामले की अगली सुनवाई पांच मार्च को होगी। पीठ ने 26/11 के मुंबई हमले और वर्ष 2016 में पटियाला हाउस कोर्ट में हुई घटना का जिक्र करते हुए कहा कि कोर्ट और ट्रिब्यूनल में सीसीटीवी कैमरे लगाने का आदेश देने का मकसद शिष्टाचार, सुरक्षा और न्यायिक कार्यवाही पर निगरानी रखना था।
पीठ ने कहा, विक्टोरिया टर्मिनस रेलवे स्टेशन पर लगे सीसीटीवी कैमरे की वजह से ट्रायल कोर्ट में अजमल कसाब पर शिकंजा कसा जा सका। वहीं वर्ष 2002 में नागपुर जिला अदालत परिसर में पिंटो शिर्के को सरेआम मौत के घाट उतारने की घटना का जिक्र करते हुए कहा कि इस घटना का सीसीटीवी साक्ष्य उपलब्ध नहीं था। सैकड़ों लोगों के सामने घटना होने के बाद भी कोई भी व्यक्ति सामने नहीं आया।
कई घटनाओं में साबित हो सकते हैं फायदेमंद
पीठ ने कहा, सीसीटीवी कैमरे कई घटनाओं में फायदेमंद साबित हो सकते हैं। पीठ ने एनजीटी समेत कई ट्रिब्यूनल में सीसीटीवी कैमरे लगाने पर सरकार के काम की सराहना की। साथ ही कहा, अगर निजता का मामला हो तो सीसीटीवी कैमरों को बंद किया जा सकता है।
स्टेट ट्रिब्यूनल में भी सीसीटीवी लगाने पर विचार करे सरकार
नई तकनीक को अपनाने की वकालत करते हुए पीठ ने केंद्र सरकार से कहा कि वह स्टेट ट्रिब्यूनल आदि में भी सीसीटीवी कैमरे लगाने पर विचार करें। सुनवाई के दौरान अमाइकस क्यूरी वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ लूथरा ने पीठ को सुझाव दिया कि यौन हिंसा के पीड़ितों और संरक्षित गवाहों की सुरक्षा पर भी गौर किया जाना चाहिए।