रांची के मोरहाबादी मैदान में झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता हेमंत सोरेन ने रविवार को राज्य के 11वें मुख्यमंत्री के रुप में शपथ ले ली। इस समारोह में एक बार फिर विपक्षी एकता की तस्वीर साफ दिखाई दी। हेमंत सोरेन के शपथ ग्रहण समारोह में कांग्रेस नेता राहुल गांधी और राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के अलावा पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी, आम आदमी पार्टी सांसद संजय सिंह, राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव, लोकतांत्रिक जनता दल के नेता शरद यादव, डीएमके नेता स्टालिन और सीपीआई के नेता डी राजा शामिल हुए। शपथ ग्रहण समारोह के बाद विपक्षी दल के नेताओं ने एक बार फिर हाथ उठाकर तस्वीरें खिंचवाईं जैसा कि पूर्व में कर्नाटक में कुमार स्वामी के शपथ ग्रहण समारोह के दौरान दिखाई पड़ी थीं।
विपक्षी एकता की इस तस्वीर के बाद एक बार फिर यह सवाल उठने लगे हैं कि विपक्षी एकता का यह मंत्र बदली परिस्थितियों में कितना कारगर रहेगा क्योंकि पूर्व में इस तरह की तस्वीरों ने उम्मीद तो बहुत बंधवाई थी, लेकिन बाद में यह अपेक्षित परिणाम देने में असफल साबित हुआ था। ऐसा कर्नाटक में कुमार स्वामी के शपथ ग्रहण के बाद भी हुआ और ममता बनर्जी की रैली के बाद भी। सवाल यह भी उठने लगे हैं कि क्या झारखंड के संदेश से दिल्ली और बिहार के विपक्षी दलों को कोई सबक मिला है और क्या ऐसा कोई चुनाव पूर्व गठबंधन यहां भी आकार ले सकता है?
स्वामी के शपथ ग्रहण समारोह में भी दिखी थी ऐसी तस्वीर
कर्नाटक के विधानसभा चुनाव परिणाम ने भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए कांग्रेस को जनता दल सेक्युलर का समर्थन करने को मजबूर कर दिया। इस गठबंधन से जेडी (एस) नेता एचडी कुमारस्वामी ने 23 मई 2018 को राज्य के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इस शपथ ग्रहण समारोह में विपक्ष ने अपनी एकता की मजबूत तस्वीर दिखाई। इस समारोह में सोनिया गांधी और राहुल गांधी के अलावा ममता बनर्जी, शरद पवार, अखिलेश यादव, मायावती, अरविंद केजरीवाल, अजीत सिंह, तेजस्वी यादव, चंद्राबाबू नायडू, सीताराम येचुरी, पी विजयन और डी राजा जैसे दिग्गज नेता शामिल हुए। शपथ ग्रहण समारोह के बाद इन नेताओं ने आपस में हाथ पकड़कर हाथ ऊंचा किए हुए जो तस्वीरें खिंचवाई, उन तस्वीरों ने सत्ता पक्ष के लिए भविष्य में मुश्किलें खड़ी करने का संकेत दिया था।
लेकिन परिणाम बताते हैं कि इन तस्वीरों ने भाजपा के लिए लंबे समय तक मुश्किलें खड़ी नहीं की। बीजेपी की लगातार बढ़ती ताकत के सामने विपक्षी एकता की इस तस्वीर से खुश होने वाले लोगों के लिए जल्दी ही निराशाजनक खबरें सामने आईं। कर्नाटक में सत्तारुढ़ जेडीएस और कांग्रेस नेताओं के बीच मनमुटाव सतह पर आ गया। कांग्रेस नेताओं से लगातार दबाव झेल रहे मुख्यमंत्री कुमारास्वामी ने सत्ता छोड़ने तक की बात कर डाली। विपक्षी एकता में फूट ने बीजेपी को मौका दिया और उसने विपक्ष के विधायकों को अपने पाले में कर राज्य में अपनी सरकार बना ली।
ममता बनर्जी के राज्य में भी दिखी थी विपक्षी एकता
इसी वर्ष जनवरी माह में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य के ब्रिगेड परेड ग्राउंड मैदान में विपक्षी दलों की एकता की बड़ी तस्वीर पेश की थी। लोकसभा चुनाव के पूर्व विपक्षी दलों की एकता के लिहाज से आयोजित की गई इस रैली में विपक्ष के दर्जन भर से ज्यादा पार्टियों के दिग्गज नेता शामिल हुए। इनमें एनसीपी नेता शरद पवार, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव, बहुजन समाज पार्टी के सतीश चंद्र मिश्रा, तेलगूदेशम पार्टी नेता चंद्रबाबू नायडू, आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल, डीएमके नेता एमके स्टालिन, नेशनल कांफ्रेंस नेता फारुख अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला, झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता हेमंत सोरेन, लोकतांत्रिक जनता दल के नेता शरद यादव, गुजरात में पटेल आंदोलन से नेता बने हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी शामिल हुए। इस रैली को यूनाइटेड इंडिया रैली का नाम दिया गया था।
कहा जाता है कि लोकसभा चुनाव के समीकरणों को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष राहुल गांधी या सोनिया गांधी इस रैली में शामिल नहीं हुए। लेकिन इसके बाद भी राहुल गांधी ने इसके प्रति अपना पूरा समर्थन व्यक्त किया। सोशल मीडिया पर राहुल गांधी ने ममता बनर्जी को विपक्ष को साथ लाने के लिए धन्यवाद दिया और इसके लिए उन्हें बधाई भी दी।