पिछले महीने राज्य कैबिनेट ने सेक्शन 118-ए को जोड़ने के साथ पुलिस को अधिक शक्ति देने का फैसला किया था। इस संशोधन के अनुसार, कोई भी व्यक्ति अगर सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति को जानबूझकर डराने और अपमान व बदनाम करने के लिए कोई आपत्तिजनक सामग्री डालता है या प्रसारित करता है, तो उसे पांच साल तक की सजा या दस हजार रुपये तक जुर्माना या दोनों की सजा दी जा सकती है।
सरकार ने बचाव में यह दलील दी
सुप्रीम कोर्ट ने साल 2015 में केरल के आईटी एक्ट की धारा 66-ए और केरल पुलिस एक्ट के 118-डी को निरस्त कर दिया। शीर्ष अदालत ने इस आधार पर इसे निरस्त किया कि ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ हैं।
वहीं, केरल सरकार ने अपने पक्ष में कहा कि कोरोना महामारी के समय कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर जमकर नफरत भरी बातें पोस्ट कीं। इसके अलावा, अफवाहें भी बढ़ीं। साथ ही महिलाओं और बच्चों के खिलाफ साइबर अपराधों में वृद्धि हुई।
सरकार ने कहा कि साइबर अपराधों के चलते नागरिकों की निजी जानकारी को बड़ा खतरा पैदा हो गया है। केरल पुलिस के पास ऐसे अपराधों के निपटने के लिए शक्ति नहीं है, इसलिए यह अध्यादेश लाना पड़ा है।