लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ महाभियोग चलाने के मामले में विपक्षी एकता में दरार दिख रही है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने इस मामले में जल्दबाजी करने के बजाय सोच-समझकर कदम उठाने और संयम बरतने का दूसरा रास्ता सुझाया है। टीएमसी का यह रुख कांग्रेस नेतृत्व के लिए असहमति का साफ संकेत है।
क्या बोले विशेषज्ञ?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि टीएमसी का यह कदम कांग्रेस को एक तरह की फटकार के तौर पर देखा जा सकता है। दरअसल, टीएमसी इस बात से नाराज है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग लाने के उसके पुराने सुझाव पर कांग्रेस ने सही प्रतिक्रिया नहीं दी थी। हालांकि, संसद में संख्या बल के हिसाब से विपक्ष एनडीए से पीछे है, इसलिए महाभियोग सफल होना मुश्किल है। इसके बावजूद, यह पूरी लड़ाई राजनीतिक संदेश देने की है।
'बंगाल कनंड्रम' के लेखक संबित पाल कहते हैं कि तृणमूल कांग्रेस दिल्ली की राजनीति में मुख्य भूमिका निभाना चाहती है। पार्टी चाहती है कि उसे विपक्षी खेमे के सबसे बड़े समूहों में से एक के रूप में पहचान मिले। टीएमसी नेताओं को लगता है कि कांग्रेस उन्हें वह सम्मान नहीं दे रही है। पार्टी ममता बनर्जी को शरद पवार और सोनिया गांधी साथ देश के तीन सबसे बड़े नेताओं में से एक मानते हैं जो अभी भी राजनीति में एक्टिव हैं, और उन्हें राहुल गांधी से पीछे नहीं देखा जा सकता।
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किसी के सामने नहीं झुकेगी पार्टी
लोकसभा में तृणमूल के 28 सांसद हैं, जबकि समाजवादी पार्टी के 37 और कांग्रेस के 99 सांसद हैं। संख्या कम होने के बावजूद तृणमूल ने साफ कर दिया है कि वह राहुल गांधी के निर्देशों पर आंख मूंदकर नहीं चलेगी। वरिष्ठ पत्रकार गौतम होरे के अनुसार, टीएमसी का यह स्टैंड पश्चिम बंगाल के आगामी विधानसभा चुनावों से भी जुड़ा है। पार्टी बंगाल की जनता को यह संदेश देना चाहती है कि वह दिल्ली में भी किसी के सामने झुकने वाली नहीं है।
उन्होंने आगे कहा, अगर आप ध्यान दें, तो टीएमसी का स्टैंड सीधे तौर पर कांग्रेस की पहल के खिलाफ नहीं है, बल्कि, वह खुद इंपीचमेंट मोशन लाना चाहती है। वह चाहती है कि पहले स्पीकर को विपक्ष की शिकायतों को सुधारने का मौका दिया जाए। अगर फिर भी सुधार नहीं होता, तभी महाभियोग जैसा कदम उठाना चाहिए।
ममता को मनाने की कोशिश में जुटी कांग्रेस
दूसरी तरफ, जब से तृणमूल ने केंद्र में यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस (यूपीए) सरकार से समर्थन वापस लिया है तब से कांग्रेस ने ममता बनर्जी को मनाने की काफी कोशिशें की हैं। बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष पद से ममता के कड़े आलोचक अधीर रंजन चौधरी को हटाकर शुभंकर सरकार को जिम्मेदारी दी गई है। कांग्रेस ने बंगाल में वामदलों से भी दूरी बनाई है ताकि तृणमूल के साथ रिश्ते सुधर सकें। हालांकि, तृणमूल ने फिलहाल इन कोशिशों को खास तवज्जो नहीं दी है और अपनी अलग राह पर चलने का फैसला किया है।
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