उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति का पद देश में बहुत महत्वपूर्ण और गरिमामय होता है। यह पद 72 साल में पहली बार विपक्ष के निशाने पर आया है। 60 सदस्यों ने अपने दस्तखत के साथ सभापति जगदीप धनखड़ के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस राज्यसभा महासचिव को सौंप दिया है। दिलचस्प है कि इस पत्र पर किसी भी दल के सदन के नेता का हस्ताक्षर नहीं है। संसदीय कार्यमंत्री किरण रिजिजू इसे सभापति के आसन का अपमान मान रहे हैं, जबकि कांग्रेस के मीडिया विभाग के प्रमुख और राज्यसभा सदस्य जयराम रमेश ने इसे विपक्षी दलों की मजबूरी बताया है।
जयराम रमेश का आरोप है कि सभापति का पक्षपातभरा व्यवहार विपक्ष को मंजूर नहीं है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने इस प्रस्ताव को लाने में प्रमुख भूमिका निभाई है। कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी भी यही आरोप लगा रहे हैं कि सभापति का व्यवहार और कामकाज का तरीका पक्षपातपूर्ण है।
सभापति की कार्यप्रणाली के प्रति अविश्वास
दरअसल, सभापति के खिलाफ इंडिया गठबंधन के नेता यह प्रस्ताव लाने की तैयारी अगस्त महीने में ही कर रहे थे। उनकी रणनीति कामयाब हो पाती कि इसके पहले ही संसद के मानसून सत्र का सत्रावसान हो गया, लेकिन शीतकालीन सत्र में विपक्षी दलों ने नियम 67(बी) के तहत सभापति की कार्यप्रणाली के प्रति अविश्वास जताया। उन्हें चर्चा के बाद पद से हटाए जाने की मांग की है। भारतीय संविधान ने नियम 67(बी) के तहत राज्यसभा के सदस्यों को इसका अधिकार दिया गया है। इसके अंतर्गत 50 सांसद इस प्रस्ताव को ला सकते हैं। प्रस्ताव के राज्यसभा में पारित होने के बाद उस पर लोकसभा की सहमति भी जरूरी है।
किन नेताओं ने किए हस्ताक्षर और यह कितना होगा असरदार?
कांग्रेस के दिग्विजय सिंह, प्रमोद तिवारी के अलावा तृणमूल कांग्रेस, वाम दल, एनसीपी (शरद पवार), आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, झारखंड मुक्ति मोर्चा, शिवसेना (उद्धव) और डीएमके के सदस्यों ने नोटिस के लिए हस्ताक्षर किए हैं। जनता दल (बीजू) ने अभी दस्तखत नहीं किया है। उसने इससे खुद को अलग करके तटस्थ रहने का फैसला किया है। यहां दिलचस्प यह है कि विपक्ष को इस प्रस्ताव के लिए जरूरी संख्याबल हासिल करने में कड़ी मशक्कत करनी पड़ सकती है। राज्यसभा में भाजपा और उसके घटक दलों के सांसदों की संख्या 112 के करीब है। इसमें अकेले भाजपा के 95 सांसद हैं। छह नामित सदस्य हैं। एक निर्दलीय सदस्य हैं। इसलिए अविश्वास प्रस्ताव को विफल करने में सत्ता पक्ष को अधिक मेहनत नहीं करनी पड़ेगी, जबकि विपक्ष को इसे पारित करने में सफलता मिलना मुश्किल लग रहा है। राज्यसभा में अविश्वास प्रस्ताव पारित भी हो जाए तो लोकसभा में इसे मंजूरी मिल पाने की संभावना भी दूर की कौड़ी जैसा है।
अविश्वास प्रस्ताव के बहाने क्या संदेश देना चाहता है विपक्ष?
लोकसभा चुनाव 2024 के नतीजे आने के बाद राहुल गांधी लोकसभा में विपक्ष के नेता चुने गए। राहुल गांधी ने सदन में नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को निशाने पर लिया था। उन पर सदन की कार्यवाही के संचालन में विपक्ष के नेता ने तब कटाक्ष भी किए थे। संसद के मानसून सत्र में इसके साफ आसार दिखाई दे रहे थे कि विपक्ष जल्द ही राज्यसभा के सभापति के खिलाफ भी मोर्चा खोल सकता है। सभापति धनखड़ ने राज्यसभा की कार्यवाही के संचालन के दौरान कई बार सदस्यों को नैतिकता का पाठ पढ़ाते हुए कड़ी फटकार लगाई थी। इसमें तृणमूल कांग्रेस के डीरेक ओ ब्रायन सबसे प्रमुख हैं। राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे और जगदीप धनखड़ के बीच सदन की कार्यवाही के दौरान नोंक-झोंक तक देखने में आई। हालांकि धनखड़ और खड़गे की सूझ-बूझ से दो-तीन बार स्थिति बिगड़ते बिगड़ते संभल गई थी।
अविश्वास प्रस्ताव लाकर क्या संदेश देना चाहता है विपक्ष?
दरअसल, विपक्ष सभापति के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाकर संदेश देना चाहता है कि केन्द्र सरकार लोकतंत्र का आदर नहीं करती। इसके दबाव में लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा लगातार गिर रही है। हालांकि, भाजपा के नेता इसे विपक्ष का मुद्दों से ध्यान भटकाने का प्रयास बता रहे हैं, लेकिन राजनीतिक दृष्टि से विपक्ष का यह प्रस्ताव उसे संजीवनी दे सकता है। सत्ता पक्ष एकतरफ इंडिया गठबंधन में बिखराव की संभावनाओं को हवा देता रहता है, वहीं इस प्रस्ताव के जरिए विपक्ष अपनी एकता का संदेश देना चाहता है। इस प्रस्ताव पर सदन में चर्चा की स्थिति में भी विपक्ष को अपना फायदा नजर आ रहा है। उधर, राज्यसभा के सभापति की बात करें तो वह उपराष्ट्रपति बनने से पहले पश्चिम बंगाल के राज्यपाल थे। राज्यपाल रहने के दौरान पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ उनका टकराव कई बार राष्ट्रीय स्तर की सुर्खियों में आया था।