करीब छह दशक के बाद वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर भारत और चीन के बीच खूनी झड़प में हमें अपने सैनिकों की शहादत देनी पड़ी। नए सिरे से दोनों देशों के बीच चरम पर पहुंची तनातनी के बीच इस तरह की वारदात बताती है कि ऐसी ही घटना लद्दाख के इतर दूसरी जगहों पर भी हो सकती है।
बातचीत तो हो रही है लेकिन विवाद सैन्य कमांडरों की वार्त से नहीं सुलझेगा। जरूरत शीर्ष स्तर पर राजनीतिक संवाद की है। सवाल है कि ऐसा क्या हुआ कि करीब 58 साल बाद हमें जवानों की शहादत देनी पड़ी। दरअसल यह विवाद बहुत लंबा खिंच गया है।
डेढ़ महीने से दो सेनाएं आमने-सामने हों तो ऐसी स्थिति आना अस्वाभाविक नहीं है। जहां तक तनाव की बात है तो यह सच है कि चीन के सैनिक चार-पांच जगहों पर हमारे इलाके में घुस आए हैं। इसमें गलवां घाटी भी है जो सामरिक और रणनीतिक दृष्टि से बेहद अहम है।
इसलिए जब सरकार ने पिछले दिनों एलएसी पर तनाव कम होने और चीनी सैनिकों की वापसी का बयान दिया तो मुझे विश्वास नहीं हुआ। मुझे अंदेशा था कि सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण इलाके में घुसपैठ के बाद चीन इतनी आसानी से नहीं मानेगा। फिर यह किसी से छिपा नहीं है कि चीन भारत के एलएसी पर अपनी तरफ किए जा रहे निर्माण कार्यों से खुश नहीं है।
इसके पीछे दूसरे वैश्विक कारण भी हो सकते हैं। मगर अहम कारण भारत की ओर से कराया जा रहा निर्माण है। सवाल है कि अब आगे क्या होगा? तनाव की स्थिति में लंबे समय तक सेना को आमने-सामने रखने से ऐसी घटनाएं हो जाती हैं। मेरा मानना है कि भारत को अब बिना कोई देर किए राजनीतिक हस्तक्षेप करना चाहिए।
(मेजर जनरल (रि.) अशोक मेहता)
यह भी पढ़ें: सामरिक रिश्तों पर विश्लेषण: गलवां घाटी पर चीन के नापाक इरादों से हालात हुए बेहद खराब
यह भी पढ़ें: गलवां घाटी: भारत-चीन के बीच 14000 फीट ऊंचाई पर तनाव, जानें 10 खास बातें