प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सैन्य बलों की हौसला आफजाई के लिए आदमपुर एयरबेस पर पहुंचे। सोमवार को बड़े गर्वीले, विजयी और आत्मबल वाले अंदाज में राष्ट्र को संबोधित किया था। ऑपरेशन सिंदूर में बड़े नुकसान के बाद भी पाकिस्तान में जश्न है। आखिर इस जश्न की वजह क्या है? भारत को इस ऑपरेशन से क्या मिला आइये समझते हैं...
बड़े नुकसान के बाद भी जश्न मना रहा है पाकिस्तान?
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल कहते हैं कि यह कोई नई बात नहीं है। हारने के बाद जश्न मनाना पाकिस्तान की पुरानी आदत है। 1971, 1975 और 1999 के बाद भी उसने ऐसा ही किया था। लेकिन सामरिक और रणनीतिक मामलों के जानकार एसके शर्मा कहते हैं कि पाकिस्तान को ऑपरेशन सिंदूर के समय दो लोगों का खुला साथ मिला है। तुर्किये ने सैन्य साजो सामान की मदद की है। चीन के विदेश मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार वांग यी ने खुलकर पाकिस्तान को समर्थन देने की घोषणा की।
रंजीत कुमार कहते हैं कि अभी तक कि किसी भी जंग या टकराव में चीन ने इस तरह से पाकिस्तान का साथ नहीं दिया था। पूर्व एयर वाइस मार्शल एनबी सिंह कहते हैं कि अभी तक पाकिस्तान के साथ तनाव के समय में चीन तटस्थ रहता था। इस बार चीन ने पाकिस्तान का साथ देने की घोषणा की है। चीन ने यह भरोसा देते समय भारत के साथ अपने संबंध की परवाह नहीं की है। इससे पाकिस्तान का खुश होना लाजिमी है।
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एक अन्य वरिष्ठ सूत्र ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर जहां पाकिस्तान के साथ चीन के लिए संदेश था, वहीं भारत के लिए भी चीन का संदेश है। इसे अब हम नजर अंदाज नहीं कर सकते। भविष्य में आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई का ही मामला क्यों न हो, दूसरा ऑपरेशन सिंदूर करने से पहले चीन को ध्यान में रखना होगा। वैसे भी चीन ने पाक अधिकृत कश्मीर में अरबों डॉलर का निवेश कर रखा है और वह पाकिस्तान के साथ इस कारण जुगलबंदी दिखाएगा।
क्या चीन ने भारत और पाकिस्तान के बीच में अड़ा दी है टांग?
चीन के विदेश मंत्री और एनएसए वांग यी ने जिस तरह से पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार को भरोसा दिया, वह इसी तरफ इशारा कर रहा है। वांग यी ने बड़े स्पष्ट शब्दों में पाकिस्तान के साथ खड़े होने की प्रतिबद्धता जताई है। दरअसल, पाकिस्तान के ग्वादर से लेकर पाक अधिकृत कश्मीर होते हुए चीन तक सीपीईसी जा रही है। पाकिस्तान अपना रक्षा साजो सामान भी 82 प्रतिशत के करीब चीन से आयात करता है। पिछले डेढ़ दशक में दोनों देशों के बीच में विभिन्न स्तरों पर सहयोग, संबंध बढ़ा है। चीन पाकिस्तान के लिए संयुक्त राष्ट्र में कई बार वीटो का इस्तेमाल कर चुका है। शंघाई सहयोग संगठन में उसकी एंट्री करा चुका है। चीन के विदेश मंत्री के ताजा बयान ने इसे और हवा दे दी है।
कश्मीर और सिंधु नदी जल समझौते पर क्या होगा?
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इस पर प्रतिक्रिया दे दी है। जायसवाल के अनुसार कश्मीर या द्विपक्षीय मुद्दा शिमला समझौता के तहत भारत और पाकिस्तान मिल बैठकर तय करेंगे। इसमें भारत को किसी भी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता स्वीकार नहीं है। जायसवाल ने अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप की इसमें मध्यस्थता की मंशा को साफ खारिज कर दिया है। पूर्व विदेश सचिव शशांक कहते हैं कि पाकिस्तान ने कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाने की भरपूर कोशिश की है। यह अभी भी जारी है। राष्ट्रपति ट्रंप लगातार इसमें मध्यस्थता की पेशकश कर रहे हैं। हमें इसको इग्नोर करना होगा। राष्ट्रपति ट्रंप की टीम को 1971 के शिमला समझौते को समझाना पड़ेगा।
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विदेश मंत्रालय के एक पूर्व अधिकारी कहते हैं कि ट्रंप को क्रेडिट लेने की आदत है। वह सब बड़ा करने के फेर में कई बार कुछ भी बोल जाते हैं। लेकिन ट्रंप प्रशासन की टीम में अन्य सदस्य हैं। वह इसकी गंभीरता को समझ रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार एक अन्य सूत्र का कहना है कि ट्रंप का कोई भरोसा नहीं है। वह कब किसको लेकर कहां क्या कह दें? कश्मीर मुद्दे को लेकर वह लगातार मध्यस्थता की बात कह रहे हैं। इसलिए यहां भारत को मेहनत करनी होगी। रूस के चैनल को प्रभावी बनाना पड़ेगा। पूर्व विदेश सचिव शशांक का भी इशारा यही है। शशांक कहते हैं कि इस विषय में भारत को अमेरिका या किसी देश से कोई बात नहीं करनी चाहिए।
सिंधु नदी जल समझौते के बारे में रणधीर जायसवाल गुडविल की बात कर रहे हैं। इसके साथ पाकिस्तान से संरक्षित आतंकवाद को जोड़कर कहते हैं कि पानी चाहिए तो पाकिस्तान को आतंकवाद के खिलाफ ठोस कदम उठाना होगा। शशांक समेत अन्य कहते हैं कि अभी इस विषय में कुछ नहीं कहना है।
अब क्या होना चाहिए?
डायरेक्टर जनरल आफ नेवल ऑपरेशन(डीजीएनओ) वाइस एडमिरल एएन प्रमोद ने डीजीएमओ की ब्रीफिंग में सैन्य आपरेशन को लेकर महत्वपूर्ण बयान दिया। उन्होंने कहा कि सैन्य आपरेशन विध्वंस के लिए नहीं होते। इसका मुख्य लक्ष्य शांति और स्थायित्व की स्थापना है। सामरिक मामलों के जानकार पूर्व मेजर जनरल सिन्हा ने इससे पूर्ण सहमति जताई, लेकिन कहा कि ऑपरेशन शुरू होने के बाद उसके समाप्त होने का भी तरीका महत्वपूर्ण है। खैर, अभी तो यह समाप्त नहीं हुआ है, लेकिन राजनीतिक नेतृत्व शर्त के साथ सामान्य स्थिति में लौटते हैं।
पूर्व विदेश सचिव शशांक को भी लग रहा है कि संघर्ष विराम से पहले पाकिस्तान से आतंकवाद के विरुद्ध ठोस भरोसा लेना जरूरी था। सिंधु नदी जल समझौते को ट्रीटी से निकाल कर दो देशों के बीच शर्त पर आधारित द्विपक्षीय समझौते की शक्ति देना आवश्यक है। विदेश और रक्षा मामलों के जानकार रंजीत कुमार कहते हैं कि ऑपरेशन सिंदूर अभी जारी है। यह तो संघर्ष विराम है। अभी तक हम केवल इतना कह सकते हैं कि पाकिस्तान से संचालित आतंकवाद पर कड़ी कार्रवाई की। कार्रवाई की प्रतिक्रिया करने पर पाकिस्तान को सबक भी सिखाया।