देश की आबादी को मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए नए नियमों को लागू कर दिया गया, लेकिन अधिकांश राज्य अब तक इसे लेकर जागरूक नहीं है। स्थिति यह है कि अधिनियम लागू होने के छह वर्ष बाद भी केवल सात राज्यों में ही मानसिक स्वास्थ्य को लेकर नियमों पर काम हुआ है जबकि 600 से ज्यादा जिलों में बोर्ड का गठन तक नहीं हुआ है।
भारत में मानसिक विकार और उससे जुड़े मुद्दे गंभीर रूप ले रहे हैं। विशेष रूप से अवसाद, चिंता, सिजोफ्रेनिया और आत्महत्या युवाओं में मृत्यु का एक प्रमुख कारण हैं। यही वजह है 2014 में भारत सरकार ने राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य नीति जारी की थी। वहीं लोगों में जागरूकता को बढ़ाने के लिए सात अप्रैल 2017 को मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम जारी किया। इसके तहत हर राज्य में एक एक मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण, जिलों में समीक्षा बोर्ड और मानसिक स्वास्थ्य पुनर्वास केंद्रों की स्थापना होनी चाहिए।
फिलहाल स्थिति है कि 23 राज्यों में मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण का गठन हुआ है जबकि 14 राज्यों में समीक्षा बोर्ड बनाए गए हैं। हालांकि यह बोर्ड हर जिले में नहीं है। केंद्र सरकार के ही आंकड़े बताते हैं कि अभी 600 से ज्यादा जिलों में मानसिक स्वास्थ्य समीक्षा बोर्ड का गठन होना बाकी है जबकि मानसिक स्वास्थ्य पुनर्वास केंद्र किसी भी जिले में शुरू नहीं हुआ है। इसके बारे में सात राज्यों ने कागजों पर प्रस्ताव जरूर तैयार किए हैं।
बोर्ड जरूरी, ताकि आसानी से मिले इलाज
जिले में मौजूद सभी मनोरोगियों का ब्योरा, स्वास्थ्य सेवा देने वाले अस्पताल, क्लीनिक, काउंसलिंग केंद्र की जानकारी बोर्ड को देना अनिवार्य है। बोर्ड प्रत्येक माह का ब्योरा राज्य व केंद्र से साझा करेगा। अगर बोर्ड का गठन नहीं होगा तो दिल्ली में मौजूद केंद्रीय प्राधिकरण के पास सभी जिलों की जानकारी उपलब्ध नहीं होगी। साथ ही, मरीजों का उपचार भी प्रभावित होगा।
एक डॉक्टर पर 1500 मरीज
भारतीय पुनर्वास परिषद के सदस्य डॉ. अरबिंदा ब्रह्मा बताते हैं कि भारत में करीब 10 हजार मनोचिकित्सक हैं जबकि 15 करोड़ से ज्यादा लोग मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियों से ग्रस्त हैं। अगर गणितीय आकलन किया जाए तो एक डॉक्टर पर 1500 से ज्यादा मरीजों की जिम्मेदारी है।
नहीं मिल रहा इंश्योरेंस...
इंडियन साइकियाट्रिक सोसाइटी के अध्यक्ष डॉ. विनय अग्रवाल का कहना है कि इंश्योरेंस कंपनियां मरीजों को सेवाएं नहीं दे रही हैं। यहां तक कि प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना में भी सभी तरह की मानसिक स्वास्थ्य स्थितियां शामिल नहीं है।