जागरुकता के चलते अब युवा इंजीनियरिंग के साथ उच्च शिक्षा के अन्य विकल्पों पर भी फोकस कर रहे हैं। यही कारण है कि बोर्ड, जेईई मेन टॉपर भी आईआईटी की बजाय अन्य कोर्स में दाखिला ले रहे हैं। यह समाज के लिए बेहतर संदेश है कि अब युवाओं को 12वीं कक्षा के बाद जानकारी रहती है कि उसे किस क्षेत्र में अपना भविष्य बनाना है। यह मानना है आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर और जेईई एडवांस 2018 के चेयरमेन प्रो. शलभ का। वे कहते हैं कि इसे नकरात्मक की बजाय सकारात्मक नजरिये से देखने की जरूरत है।
जवाब: जेईई मेन की परीक्षा देने का अब एक साल में दो बार मौका है। इसलिए यह कहना मुश्किल होगा कि जेईई मेन में छात्रों की संख्या कम हो रही है। अब छात्र जेईई मेन की तैयारी कोचिंग से करते हैं। कोचिंग में जाकर छात्रों को जानकारी मिल जाती है कि उन्हें परीक्षा में किस प्रकार का स्कोर मिल सकता है। क्योंकि कोचिंग सेंटर परीक्षा के आधार पर बेहतर स्कोर लेने वाले छात्रों के अलग ग्रुप बना देते हैं। इसके अलावा जागरुकता के चलते छात्र को पता होता है कि जेईई मेन की मेरिट में यदि डेढ़ लाख से अधिक नंबर होगा तो कहां दाखिला मिलेगा। इसलिए वे जेईई मेन के साथ विदेश, लॉ, यूपीएससी के अलावा अन्य क्षेत्र में भविष्य बनाने पर फोकस कर लेते हैं।
जवाब: आईआईटी, एनआईटी, आईआईआईटी समेत बड़े इंजीनियरिंग कॉलेजों में सीटें कम नहीं हुई हैं। इसके अलावा अब ऑनलाइन काउंसलिंग में सीट बेहद कम खाली रहती हैं। इसका अर्थ है कि इंजीनियर पास आउट करने वालों का आंकड़ा कम नहीं हुआ है। हां जो अचानक से रातोंरात इंजीनियरिंग कॉलेज खुल गए थे, वे अवश्य बंद हुए हैं। क्योंकि डिग्री देने के अलावा वे छात्रों को किसी प्रकार का तकनीकी ज्ञान नहीं दे पाते थे। इसलिए चिंता करने की जरुरत नहीं है। पारंपरिक इंजीनियरिंग कोर्स की बजाय अब नए जमाने के तकनीक व डिमांड वाले कोर्स को छात्र पसंद करते है।
जवाब: इंडस्ट्री की मांग बिल्कुल सही है। इसीलिए आईआईटी समेत बड़े इंजीनियरिंग कॉलेज इंडस्ट्री की मांग व जरूरत के आधार पर कोर्स व पाठ्यक्रम और ट्रेनिंग करवाते हैं। आईआईटी कानपुर हर तीन से पांच साल में अपना पाठ्यक्रम में बदलाव करता है। इसके अलावा नई तकनीक को शामिल करता रहता है।
जवाब: इंजीनियरिंग पर तो जानकारी दे सकता हूं पर मेडिकल क्षेत्र में नहीं। क्योंकि उससे अधिक जुड़ाव नहीं रहा है।