सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि बिना रिहाई के आजीवन कारावास देने का अधिकार केवल संवैधानिक अदालतों, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट, के पास ही है, सत्र अदालतों को नहीं। अदालत ने कहा कि आजीवन कारावास का अर्थ दोषी के पूरे जीवनकाल तक जेल में रहना होता है, लेकिन रिहाई या सजा में छूट देने का अधिकार दंड प्रक्रिया संहिता के तहत राज्य सरकार को प्राप्त है, जिसे सत्र अदालत सीमित नहीं कर सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक अहम फैसला देते हुए स्पष्ट किया कि आजीवन कारावास बिना रिहाई के देने का अधिकार केवल संवैधानिक अदालतों, यानी सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट, को है, न कि सत्र (सेशंस) अदालतों को। न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और के विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि आजीवन कारावास का अर्थ दोषी की पूरी जिंदगी तक जेल में रहना होता है, लेकिन रिहाई और सजा में छूट या परिवर्तन का अधिकार कानून के तहत राज्य सरकार के पास होता है। इसे सत्र अदालत सीमित नहीं कर सकती।
मामले में पीठ ने अपने फैसले में कहा कि सत्र अदालत यह निर्देश नहीं दे सकती कि आजीवन कारावास 'प्राकृतिक जीवन के अंत तक' होगा और दोषी को रिहाई का कोई लाभ नहीं मिलेगा। ऐसा निर्देश दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) के प्रावधानों के खिलाफ है।
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क्या था मामला?
यह मामला एक व्यक्ति से जुड़ा है जिसने एक विधवा महिला की तरफ से यौन संबंधों के प्रस्ताव को ठुकराने पर उसे आग लगाकर मार डाला था। इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को पूरी जिंदगी जेल में रखने और किसी भी तरह की रिहाई का लाभ न देने की सजा सुनाई थी, जिसे हाई कोर्ट ने भी बरकरार रखा था।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या तय किया?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सत्र अदालत को रिहाई या दया का अधिकार खत्म करने का अधिकार नहीं है, आरोपी को दी गई सजा आजीवन कारावास ही मानी जाएगी, लेकिन रिहाई या सजा में छूट का फैसला कानून के अनुसार राज्य सरकार करेगी। इसलिए ट्रायल कोर्ट की तरफ से लगाया गया 'बिना रिहाई के आजीवन कारावास' का निर्देश सही नहीं है। हालांकि, अदालत ने हत्या के अपराध में दी गई आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा, लेकिन यह स्पष्ट किया कि रिहाई का अधिकार कानून के तहत बना रहेगा।