देश की अदालतों में मुकदमे जिस कछुआ चाल से चलते हैं, उसकी वजह है, जजों पर मुकदमों का भारी बोझ। देश में आबादी की तुलना में जजों की संख्या काफी कम है। यहां हर दस लाख आबादी पर फिलहाल 18 जज हैं। जबकि 29 वर्ष पहले विधि आयोग ने हर दस लाख की आबादी पर 50 जज नियुक्त करने की सिफारिश की थी। देश की सबसे अधिक आबादी वाले उत्तर प्रदेश में तो साढ़े दस लाख से ज्यादा की आबादी पर 18 जज हैं।
विधि मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, देश में हर दस लाख की आबादी पर महज 17.86 जज हैं। मिजोरम में आबादी और जज का अनुपात सबसे अधिक है, वहां यह अनुपात 57.74 है। दिल्ली में यह अनुपात 47.33 है। सबसे दयनीय स्थिति पश्चिम बंगाल की है, जहां यह अनुपात महज 10.45 है।
सुप्रीम कोर्ट में 31 जजों की बजाय फिलहाल 28 हैं। यानी कुल क्षमता से तीन कम है। वहीं देश के 24 हाईकोर्ट में 1079 जज होने चाहिए। लेकिन इनमें 477 जजों की कमी है। निचली अदालतों में जजों की संख्या 20502 होनी चाहिए लेकिन दिसंबर, 2015 तक 16070 जज थे। यानी निचली अदालतों में 4432 न्यायिक अधिकारियों की कमी है।
मालूम हो कि पिछले दिनों एक सम्मेलन में भारत के प्रधान न्यायाधीश टीएस ठाकुर ने जजों की कमी पर तकलीफ जताई थी। प्रधान न्यायाधीश ने कहा था कि 1987 में विधि आयोग ने 10 लाख की आबादी पर 50 जज होने की सिफारिश की थी लेकिन अब तक इस दिशा में कुछ नहीं किया गया। यहां तक कि वर्ष 2002 में सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने एक फैसले में जजों की संख्या बढ़ाने की बात कही थी, बावजूद इसके कुछ नहीं हुआ।
यूपी की हालत और खराब
देश भर में प्रति दस लाख लोगों पर 18 जजों का औसत है। लेकि न उत्तर प्रदेश में यह औसत और बिगड़ा हुआ है। यहां 10.54 लाख लोगों पर 18 जज हैं।
जजों की कमी
सुप्रीम कोर्ट - 3
हाई कोर्ट - 477
निचली अदालतें - 4432