देश में लोकसभा और राज्यों के चुनाव एक ही समय कराए जाने का विरोध करने वालों का कहना है कि इससे संघीय व्यवस्था और लोकतंत्र प्रभावित हो सकते हैं। लेकिन पूर्व सीजेआई गवई और विधि आयोग का मानना है कि ऐसा नहीं होगा, क्योंकि चुनाव की मूल प्रक्रिया और अधिकार नहीं बदलेंगे- सिर्फ चुनाव की टाइमिंग बदलेगी।
भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने संसद की संयुक्त समिति (जेपीसी) के सामने कहा कि 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' (एक साथ लोकसभा और विधानसभा चुनाव) कराने का प्रस्ताव संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन नहीं करता। उन्होंने समझाया कि संविधान का मूल ढांचा मुख्य रूप से संघीय व्यवस्था और लोकतांत्रिक शासन जैसे सिद्धांतों पर आधारित है। उनके अनुसार, प्रस्तावित कानून इन दोनों में कोई बदलाव नहीं करता, इसलिए यह संविधान के अनुरूप है।
यह प्रस्ताव सिर्फ चुनाव कराने के समय और तरीके में बदलाव करता है।
चुनाव की प्रक्रिया, मतदाताओं के अधिकार और लोकतांत्रिक व्यवस्था जैसी की तैसी रहेंगी।
संसद को संविधान में संशोधन करके चुनावों को एक साथ कराने का अधिकार प्राप्त है।
सरकार की जवाबदेही पर भी असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि अविश्वास प्रस्ताव जैसे संवैधानिक प्रावधान पहले की तरह मौजूद रहेंगे।
'पहले भी साथ-साथ चुनाव हो चुके हैं'
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पूर्व सीजेआई बीआर गवई ने याद दिलाया कि 1967 तक भारत में लोकसभा और राज्यों के चुनाव एक साथ होते थे, यानी यह कोई नया प्रयोग नहीं बल्कि पहले से अपनाई गई व्यवस्था रही है।
किन विधेयकों पर चल रही है चर्चा
संसदीय समिति अभी दो प्रमुख विधेयकों पर विचार कर रही है। इसमें संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024 शामिल है। इनका उद्देश्य है कि कुछ राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल घटाकर या समायोजित करके भविष्य में सभी चुनाव एक साथ कराए जा सकें।
अन्य विशेषज्ञों का भी समर्थन
23वें विधि आयोग ने भी हाल ही में राय दी कि यह प्रस्ताव संविधान के मूल ढांचे, संघीय व्यवस्था और मतदाता अधिकारों के खिलाफ नहीं है। इससे सरकार के इस चुनाव सुधार प्रस्ताव को अतिरिक्त समर्थन मिला है।