देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने के लिए लाए जा रहे संविधान संशोधन विधेयक को मंगलवार 17 दिसंबर को लोकसभा में पेश किया जा सकता है। गौरतलब है कि इस विधेयक में एक प्रावधान ऐसा भी है, जिसमें विधानसभा चुनाव, लोकसभा चुनाव के साथ नहीं कराए जा सकेंगे। इस प्रावधान में विशेष परिस्थितियों में लोकसभा और विधानसभा चुनाव अलग-अलग कराने के शर्त बताई गई है।
इस स्थिति में कराए जा सकते हैं लोकसभा और विधानसभा चुनाव अलग-अलग
संविधान संशोधन विधेयक में कहा गया है कि राष्ट्रपति यह आदेश जारी कर सकते हैं कि जो विधानसभा लोकसभा के साथ चुनाव नहीं करा सकती, उसके चुनाव बाद में कराए जा सकते हैं। संविधान (129वें) संशोधन विधेयक की धारा 2 उपधारा 5 के अनुसार, 'यदि चुनाव आयोग की राय है कि किसी विधानसभा के चुनाव, लोक सभा के चुनाव के साथ नहीं कराए जा सकते, तो वह राष्ट्रपति से इसकी घोषणा करने की सिफारिश कर सकता है कि उस विधानसभा के चुनाव बाद में कराए जा सकते हैं।' संविधान संशोधन विधेयक के जरिए संविधान में एक नया अनुच्छेद जोड़ने और तीन अनुच्छेदों में संशोधन करने की तैयारी है, ताकि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जा सकें।
संविधान में करने होंगे ये संशोधन
विधेयक में एक नया अनुच्छेद 82ए जोड़ने का प्रस्ताव है, जिसमें लोक सभा और सभी विधान सभाओं के लिए एक साथ चुनाव कराना तथा अनुच्छेद 83 (संसद के सदनों की अवधि), अनुच्छेद 172 (राज्य विधान सभाओं की अवधि) और अनुच्छेद 327 (विधान सभाओं के चुनावों के संबंध में प्रावधान करने की संसद की शक्ति) में संशोधन किया जाएगा। इसमें यह भी प्रावधान है कि इसके अधिनियमित होने के पश्चात, आम चुनाव के बाद लोक सभा की पहली बैठक की तारीख को राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचना जारी की जाएगी। अधिसूचना की वह तारीख ही नियत तिथि कहलाएगी। लोक सभा का कार्यकाल नियत तिथि से पांच वर्ष का होगा। नियत तिथि के बाद और लोक सभा के पूर्ण कार्यकाल की समाप्ति से पूर्व तक विधानसभाओं का कार्यकाल होगा और लोकसभा के कार्यकाल के साथ ही विधान सभाओं का कार्यकाल भी समाप्त हो जाएगा।
उल्लेखनीय है कि देश में आजादी के बाद कुछ वर्षों तक लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ ही हुए थे। इनमें 1951, 1957, 1962 और 1967 के आम चुनाव के साथ विधानसभाओं के भी चुनाव हुए थे।