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चिंताजनक: हर पांचवां भारतीय विटामिन डी की कमी से पीड़ित; शहरीकरण, बढ़ता प्रदूषण और आधुनिक जीवनशैली बनी वजह

Fri, 11 Apr 2025 05:04 AM IST
शिव शुक्ला अमर उजाला नेटवर्क

सार

विटामिन डी की कमी का असर सिर्फ हड्डियों तक सीमित नहीं है। यह मांसपेशियों की कमजोरी, थकान, अवसाद, दिल की बीमारियों, टाइप-2 डायबिटीज के साथ स्तन और प्रोस्टेट कैंसर के खतरे को भी बढ़ाती है। प्रतिरक्षा को कमजोर करती है और पुरानी बीमारियों के खतरों को बढ़ाती है।
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विटामिन-डी - फोटो : freepik.com
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विस्तार
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भारत जैसे देश में जहां सालभर सूरज की रोशनी भरपूर मिलती है, वहां विटामिन डी की व्यापक कमी चौंकाने वाली है। हर पांचवां भारतीय इस जरूरी विटामिन की कमी से जूझ रहा है। भारत में यह एक छिपी महामारी के रूप में फैल रही है। यह जानकारी भारतीय अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंध अनुसंधान परिषद (आईसीआरआईईआर) की ओर से प्रस्तुत भारत में विटामिन डी की कमी को दूर करने के लिए रोडमैप नामक रिपोर्ट में सामने आई है।

रिपोर्ट के मुताबिक, देश के विभिन्न क्षेत्रों में इस कमी का स्तर काफी भिन्न है। उत्तर भारत में 9.4 फीसदी से लेकर पूर्वी भारत में यह लगभग 39 फीसदी तक पहुंच चुका है। हालांकि, माना जाता है कि भारत में धूप की कोई कमी नहीं है, लेकिन वास्तविकता यह है कि शहरीकरण, बढ़ता प्रदूषण और आधुनिक जीवनशैली लोगों को पर्याप्त सूर्य संपर्क से वंचित कर रही है। खासतौर पर शहरों में वायु प्रदूषण यूवीबी किरणों को त्वचा तक पहुंचने से रोकता है, जिससे विटामिन डी का निर्माण बाधित होता है।

सूर्य के संपर्क में ज्यादा रहें

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सरकार ने इस दिशा में कुछ कदम उठाए हैं। जैसे दूध और तेल में विटामिन डी का फोर्टिफिकेशन और इसे आवश्यक दवाओं की सूची में शामिल करना। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने भी भारतीयों के लिए आहार संबंधी दिशा निर्देश जारी किए हैं, जिसमें सूर्य के संपर्क में रहने पर जोर दिया गया है।

49 करोड़ लोगों में कमी
साइन्स जर्नल नेचर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2022 में भारत के लगभग 49 करोड़ लोग विटामिन-डी की कमी से ग्रस्त थे। इसी शोध के अनुसार भारत, पाकिस्तान, ट्यूनीशिया अफगानिस्तान और अफ्रीकी देशों में कुल आबादी के लगभग 45 फीसदी लोग विटामिन डी की कमी से जूझ रहे थे।

सिर्फ हड्डियों तक सीमित नहीं असर

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विटामिन डी की कमी का असर सिर्फ हड्डियों तक सीमित नहीं है। यह मांसपेशियों की कमजोरी, थकान, अवसाद, दिल की बीमारियों, टाइप-2 डायबिटीज के साथ स्तन और प्रोस्टेट कैंसर के खतरे को भी बढ़ाती है। प्रतिरक्षा को कमजोर करती है और पुरानी बीमारियों के खतरों को बढ़ाती है।

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