एक बार फिर फ्रांस से लेकर भारत तक समान नागरिक संहिता यानी 'कॉमन सिविल कोड' के पक्ष में मांग उठने लगी है। फ्रांस के राष्ट्रपति एमैनुएल मैक्रों ने जहां दबे-छिपे इसका समर्थन किया है वहीं भारत में इसे लागू करने का भाजपा का पुराना इरादा रहा है। मैक्रों चाहते हैं उनके देश का संविधान सभी धर्मों से ऊपर हो। मौजूदा परिस्थितियों में कॉमन सिविल कोड पर बहस मौजूं है।
आरएसएस बहस के पक्ष में
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) ने समान नागरिक संहिता पर देश में चर्चा शुरू करने की मंशा जताई है तो महाराट्र में सत्तारूढ़ शिवसेना भी इसके पक्ष में नजर आई। हिंदूत्व की सियासत करने वाली शिवसेना ने स्पष्ट कहा कि देश में समान नागरिक संहिता लागू की जाना चाहिए। वहीं मुस्लिमों की अग्रणी संस्था पर्सनल लॉ बोर्ड इसके पक्ष में नहीं है।
क्या है कॉमन सिविल कोड
किसी भी देश के सभी नागरिकों के मूलभूत कानून समान होना चाहिए। खासकर सामाजिक व्यवस्थाओं को लेकर इनकी खास जरूरत है। फौजदारी मामलों में तो पहले से ही कानून की नजर में सब समान हैं। सामाजिक व्यवस्थाओं के लिए भी धर्म, जाति और वर्ग से परे देश में शादी, तलाक, उत्तराधिकार और दत्तक समेत तमाम मुद्दों के एक समान कानून होना चाहिए। इसमें धर्म के आधार पर कोई अलग कोर्ट या अलग व्यवस्था नहीं होती।
देश में संविधान के अनुच्छेद 44 में समान नागरिक संहिता को लेकर प्रावधान हैं। इसमें कहा गया है कि राज्य इसे लागू कर सकता है। इसका उद्देश्य धर्म के आधार पर किसी भी वर्ग विशेष के साथ होने वाले भेदभाव या पक्षपात को खत्म करना है।
संविधान सभा में उठा था मसला
1947 में आजादी के बाद नए शासन तंत्र व व्यवस्थाओं के निर्माण के लिए संविधान सभा का गठन किया गया था। जून 1948 हुई इसकी एक बैठक में संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू को बताया था कि पूरे हिंदू समाज में जो छोटे-छोटे अल्पसंख्यक समूह हैं, उनके विकास के लिए हिंदू कानूनों यानी पर्सनल लॉ में मूलभूत बदलाव जरूरी है, लेकिन कई दिग्गज नेताओं ने हिंदू कानूनों में सुधार का विरोध किया।
इसी कारण समान नागरिक संहिता को नीति-निर्देशक तत्वों में शामिल किया गया न कि अनिवार्य प्रावधान के रूप में।
हिंदू कोड बिल के वक्त भी विरोध
दिसंबर 1949 में जब हिंदू कोड बिल पर बहस हुई थी, तब 28 में से 23 वक्ताओं ने इसका विरोध किया था। 1951 में तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि यदि ऐसा बिल पास हुआ तो वह अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल करेंगे। बाद में तत्कालीन पीएम नेहरू ने इस हिंदू कोड बिल को तीन अलग-अलग कानूनों में बांट दिया और प्रावधान नरम कर दिए थे।
मुस्लिम भी पक्ष में नहीं
संविधान के अनुच्छेद 44 से मुस्लिम पर्सनल लॉ को निकलवाने के कई बार प्रयास करने वाले मोहम्मद इस्माइल कहना है कि एक धर्म निरपेक्ष देश में पर्सनल लॉ में दखलंदाजी नहीं होना चाहिए। मुस्लिम विचारकों का कहना है कि भारत की छवि अनेकता में एकता की है और इतनी विविधता वाले देश में क्या पर्सनल कानूनों में एकरूपता संभव है? ऐसे भिन्न-भिन्न विचारों के बीच भारत में समान नागरिक संहिता कैसे अस्तित्व में आ पाएगी, कहना मुश्किल है।