आधिकारिक प्रकाशन के बजाए निजी किताब के आधार पर नागरिकों के अधिकारों को निष्फल करने के केंद्र सरकार की कोशिश पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताई है। एक निजी किताब के आधार पर सरकार ने ओबीसी श्रेणी के चार लोगों को सीआरपीएफ में कांस्टेबल की नौकरी देने से इनकार कर दिया था। उस किताब के आधार पर इन चारों को ओबीसी की बजाए सामान्य श्रेणी का मान लिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी को नौकरी देने का आदेश दिया है।
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जस्टिस एस ए बोबडे और जस्टिस एल नागेश्वर राव की पीठ ने पाया कि सैनी, मोमिन (अंसारी), गुज्जर और कहार जाति के चार प्रतिभागियों को सिर्फ इस आधार पर ओबीसी मानने से इनकार कर दिया गया था, क्योंकि ‘स्वामी कम्पाइलेशन ऑन रिजर्वेशन एंड कन्सेसन’ नामक किताब में दर्ज ओबीसी सूची में ये चारों जातियां नहीं थीं। आरक्षण के इतिहास को खंगालने पर पीठ ने पाया कि इंदिरा शाह के मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मद्देनजर भारत सरकार ने नौकरी में ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण देने का निर्णय लिया था। विशेषज्ञ समिति की सिफारिश के तहत हर राज्य के लिए ओबीसी की केंद्रीय सूची बनाई गई।
सन् 2000 में उत्तराखंड बना था
सुप्रीम कोर्ट
उत्तर प्रदेश के लिए बनी ओबीसी की केंद्रीय सूची में इन चारों प्रतिभागियों की जातियां थीं। वर्ष 2000 में उत्तराखंड बना था। पीठ ने पाया कि दीपक कुमार के मामले में दिए आदेश में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के एक पत्र का जिक्र था, जिसमें कहा गया था कि जब तक उत्तराखंड के लिए ओबीसी की केंद्रीय सूची को अंतिम रूप नहीं दे दिया जाता तब तक वहां उत्तर प्रदेश की सूची प्रभावी रहेगी। दिसंबर, 2011 में केंद्र सरकार ने उत्तराखंड के लिए ओबीसी की केंद्रीय सूची को अधिसूचित किया। इस सूची में 84 जातियां थी।
पीठ ने चारों प्रतिभागियों को नौकरी देने का आदेश देते हुए कहा है कि भारत सरकार को राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के निर्णय और अपने आधिकारिक प्रकाशन के आधार पर चलना चाहिए न कि किसी निजी किताब के आधार पर। पीठ ने कहा है कि सरकार द्वारा ऐसा करना नागरिकों के अधिकारों को निष्फल करने का प्रयास है। पीठ ने इसे निंदनीय बताया है। पीठ ने कहा कि इन चारों की नियुक्ति में उनकी उम्र बाधा नहीं बननी चाहिए। हालांकि उनकी फिटनेस की जांच की जा सकती है।
क्या है मामला
- 24 जुलाई 2010 को सीआरपीएफ में कांस्टेबल की भर्ती के लिए आवेदन मंगाए थे। इसके जरिए कुल 78 लोगों की भर्ती होनी थी। इनमें नौ पद ओबीसी वर्ग के लिए थे। इनमें ओबीसी की 13 बैकलॉग रिक्तियां भी थीं। कमल किशोर सहित चारों प्रतिभागी लिखित परीक्षा में सफल हुए और मेडिकल जांच में भी हिस्सा लिया। लेकिन अंतिम सूची में इनके नाम नहीं थे। पूछताछ करने पर पता चला कि इन चारों को सामान्य श्रेणी में डाल दिया गया था, क्योंकि ‘स्वामी कम्पाइलेशन ऑन रिजर्वेशन एंड कन्सेसन’ नामक किताब में दर्ज ओबीसी सूची में ये चारों जातियां नहीं थीं।
जिसके बाद चारों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां उनके पक्ष में फैसला आया। इस फैसले को भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने दलील दी थी कि दिसंबर, 2011 में केंद्र सरकार ने उत्तराखंड के लिए ओबीसी की केंद्रीय सूची को अधिसूचित किया था, जबकि ये नियुक्तियां वर्ष 2010 की है, लिहाजा इन चारों को इसका लाभ नहीं मिल सकता। शीर्ष अदालत ने सरकार के इस तर्क को अस्वीकार कर दिया।