दसॉ़ल्ट और रिलायंस के जेवी पर सफाई देते हुए एरिक ने कहा, 'पिछले साल जब हमने जेवी बनाया तो जेवी बनाने का फैसला 2012 में किए गए सौदे का हिस्सा था लेकिन हमने कांट्रैक्ट पर हस्ताक्षर होने का इंतजार किया। हम इस कंपनी में 50:50 के तहत 800 करोड़ रुपये निवेश करने थे। जेवी में दसॉल्ट के 49 और रिलायंस के 51 प्रतिशत शेयर हैं। हम अभी तक इसमें 40 करोड़ रुपये निवेश कर चुके हैं लेकिन यह 800 करोड़ रुपये तक बढ़ेगा। जिसमें 400 करोड़ रुपये दसॉल्ट आने वाले पांच सालों में देगा।'
ट्रैपियर से जब पूछा गया कि उनका शुरुआती समझौता भारत के सार्वजनिक उपक्रम या फिर हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) के साथ हुआ था तो वह जारी क्यों नहीं रहा। इसपर उन्होंने कहा कि यदि 126 लड़ाकू विमानों का उत्पादन करने की डील आगे बढ़ती तो उन्हें एचएएल या फिर मुकेश अंबानी के रिलायंस के साथ काम करने में कोई दिक्कत नहीं थी। उन्होंने कहा, 'क्योंकि 126 विमानों की डील आगे नहीं बढ़ी क्योंकि भारत सरकार को फ्रांस से अविलंब 36 विमान चाहिए थे। इसके बाद मैंने रिलायंस और एचएएल के साथ काम करने का फैसला लिया। कुछ दिनों पहले ही एचएएल ने कहा था कि वह ऑफसेट साझेदार बनने में कोई दिलचस्पी नहीं रखता है। इसलिए नई निजी कंपनी रिलायंस में निवेश करने का फऐसला मेरा था।'
कांट्रैक्ट के हिसाब से हम वायुसेना को राफेल की पहली डिलिवरी अगले साल सितंबर में करने वाले है। यह समय पर हो जाएगी। उन्होंने बताया कि रिलायंस से पहले टाटा और अन्य कंपनियों से भी साझेदारी के लिए बातचीत हुई थी। 2011 में टाटा के साथ ही अन्य विमान कंपनियों से बातचीत हुई। मगर आखिर में रिलायंस की इंजीनियरिंग सुविधाएं देखते हुए हमने उनके साथ जाने का फैसला किया। विमान के बारे में बोलते हुए सीईओ ने कहा कि वर्तमान विमान में हथियार और मिसाइलों को छोड़कर सभी जरूरी उपकरण मौजूद हैं। हथियार दूसरे कांट्रैक्ट में भेजे जाएंगे। हथियारों को छोड़कर सभी चीजों से परिपूर्ण विमान को दसॉल्ट देगा।