फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

पुरी साहब, अच्छी एक्टिंग के लिए कौन-कौन सी चीजें जरूरी होती हैं?

Fri, 06 Jan 2017 12:06 PM IST
राजेश जोशी रेडियो संपादक / बीबीसी हिंदी
विज्ञापन
om puri
विज्ञापन
'दुबले भाई' यानी मैं, और 'लेनिन जूनियर' नाम पड़ा बीबीसी एफएम के प्रेजेंटर विदित मेहरा का। विदित का खल्वाट और ठुड्डी पर लेनिन-नुमा दाढ़ी देखकर ओमपुरी छूटते ही बोले - ये तो लेनिन जूनियर है और मेरी दुबली पतली काया को उन्होंने नाम दिया 'दुबले भाई'। दुनिया भर में मशहूर कद्दावर फिल्म एक्टर ओम पुरी का पहली ही मुलाकात में हमसे इस कदर बेतकल्लुफ हो जाना उम्मीद से परे की बात थी।
विज्ञापन


हमारे लिए तो वो तार की तरह तने रहने वाला 'अर्धसत्य' का सब इंस्पेक्टर अनंत वेलणकर थे, जो आखिर में रामा शेट्टी को गला दबाकर मार देता है। या 'आक्रोश' का आदिवासी लाहण्या, जो पूरी फिल्म में सिर्फ चुप रहता है और आखिर में कुल्हाड़ी से अपनी बहन की गरदन काट देता है।

या फिर सत्यजीत रे की फिल्म 'सद्गति' का दुखिया, जो आखिरकार भूख की ज्वाला में भस्म हो जाता है। उत्तरी बंगाल के सिलिगुड़ी शहर में ओमपुरी के साथ गुजारे दो दिन इतना अंदाजा लगाने के लिए काफी थे कि इस मंझे हुए कलाकार ने अपनी शोहरत को व्यक्तित्व पर सवार नहीं होने दिया है। 
विज्ञापन

बीबीसी हिंदी और रेडियो मिष्टी के सालाना कार्यक्रम में इस बार खास मेहमान के तौर पर ओम पुरी को आमंत्रित किया गया था। होटल के कमरे में दोपहर के भोजन से पहले गपशप के दौरान एक्टिंग का जिक्र हुआ और ओम पुरी के भीतर का एक्टर उनके सेलेब्रिटी स्टेटस को तुरंत किनारे धकेलकर सामने आ गया। सवाल मैंने ही किया था: "पुरी साहब, अच्छी एक्टिंग के लिए कौन-कौन सी चीजें जरूरी होती हैं?"

जवाब में ओम पुरी कुर्सी से उठ खड़े हुए और होटल के कमरे में ही एक्टिंग की क्लास शुरू हो गई। एक्टिंग की ट्रेनिंग लेने के लिए 1970 में पंजाब के एक छोटे से गाँव से निकल कर दिल्ली के नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा पहुँचने वाले इस इंसान ने अपने भीतर आज भी एक्टिंग के छात्र को जीवित रखा है।

"अगर आपके सामने मय्यत या अर्थी पड़ी हो तो आप क्या करते हैं? आप सीधे उसके पास पहुँचकर रोने नहीं लगते। आप अपनी गाड़ी खड़ी करते हैं या ड्राइवर को बताते हैं कि गाड़ी कहाँ खड़ी करनी है, अपने आसपास का जायजा लेते हैं और तब आगे बढ़ते हैं," ओमपुरी बोले और अपने खाली कमरे में चले गए।

 

कुछ ही पलों बाद उनके खाली कमरे से आवाजें आने लगीं, जैसे कोई तमाम लोगों को जरूरी निर्देश दे रहा हो। फिर वो सधे हुए कदमों से कमरे से निकले धीरे-धीरे चलते हुए गंभीर मुद्रा में हमारे सामने खड़े हो गए। हमारे सामने चेचक के दाग़ों भरा एक जाना-पहचाना चेहरा था। उनकी भेद डालने वाली एक जोड़ी आँखें और माथे पर पड़े हुए बल।

वो पत्थर की तरह वहाँ खड़े थे और पूरे कमरे में इस शख्स की मौजूदगी की वजह से ग़मी छा गई। ऐसा महसूस होने लगा कि वाकई सामने कोई अरथी रखी हुई हो। सत्यजीत रे की 'सद्गति', गोविंद निहलाणी की 'अर्धसत्य' और 'आक्रोश', कुंदन शाह की 'जाने भी दो यारो', श्याम बेनेगल की 'सुसमन' में यादगार भूमिकाएँ निभाने वाले ओम पुरी की हिंदुस्तान और पाकिस्तान ही नहीं, बल्कि विश्व सिनेमा में खास जगह है।

वो उन बिरले भारतीय अभिनेताओं में से हैं, जिन्हें हॉलीवुड और ब्रिटिश सिनेमा में भी उतना ही स्वीकार किया गया, जितना हिंदुस्तानी फिल्मों में। ब्रिटिश फिल्म 'ईस्ट इज ईस्ट', 'माइ सन द फैनेटिक' और हॉलीवुड की 'सिटी ऑफ ज्वाय' और 'वुल्फ' में उन्होंने अपनी अभिनय क्षमता का लोहा मनवाया है।
 

- फोटो : amar ujala
उन्हें विभिन्न भूमिकाओं के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, फिल्मफेयर पुरस्कार और पद्मश्री के अलावा कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं। साथ ही ब्रिटिश सरकार ने उन्हें 2004 में 'ऑर्डर ऑफ द ब्रिटिश एंपायर' या ओबीई से सम्मानित किया था। ओम पुरी 1973 में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से ग्रैजुएट होकर निकल गए थे।

43 साल बाद भी वो अब तक अपने साथ एनएसडी के उस माहौल को बचाकर रख पाए हैं, जहाँ दिनभर की क्लास के बाद लड़के-लड़कियाँ हॉस्टल में बेतकल्लुफी से बहस-मुबाहसा करते हैं। खास तौर पर शाम को महफिल जमाने का उनका शौक बरकरार है। एनएसडी के उन्हीं दिनों से ही नसीरुद्दीन शाह उनके दोस्त हैं।

ओम पुरी बताते हैं, "मैं जब एनएसडी में गया तो एकदम शाकाहारी था, लेकिन नसीर ने मुझे गोश्त खाना सिखाया। पहले सिर्फ शोरबा दिया। फिर छोटी बोटी से शुरुआत की"। दोनों की दोस्ती अब भी बरकरार है। दो साल पहले बीबीसी हिंदी के साथ एक इंटरव्यू के दौरान शाह ने कहा था कि वो ओम पुरी की सेहत को लेकर चिंतित रहते हैं।
 
विज्ञापन

- फोटो : Getty
बहुत से लोग कहते हैं कि ओम पुरी की अभिनय प्रतिभा की रेंज उनके पुराने दोस्त नसीरुद्दीन शाह से भी ज्यादा व्यापक है। नसीर की एक्टिंग में उनकी टेक्नीक झलक जाती है, जबकि ओम पुरी का अभिनय इतना कुदरती होता है कि एक्टिंग की तकनीक नजर ही नहीं आती। इसे उनके व्यक्तित्व की खूबी कहें या उनकी अभिनय कला का असर कि जब आप इस शख्स के साथ आमने-सामने बैठे होते हैं

तो वो आपको ये भूलने पर मजबूर कर देते हैं कि आप किसी सेलिब्रिटी या अंतरराष्ट्रीय स्तर के एक्टर के साथ बैठे हैं। उनकी बातचीत का अंदाज, देसी मुहावरे, पेट में बल डाल देने वाले चुटकुले (जिन्हें यहाँ तफसील से नहीं लिखा जा सकता), बेतकल्लुफी, पंजाबी खुलापन और खासतौर पर उनका सादापन आपको एक ऐसे वातावरण में ले जाता है

जहाँ औपचारिकता एक ग़ैरजरूरी बेवकूफी सी लगने लगती है। ओमपुरी आपको वो स्पेस देते हैं - और आपसे वो स्पेस लेते भी हैं - जिसमें आप उनसे बहस कर सकते हैं, उनसे असहमत हो सकते हैं, वो ऊँची आवाज में अपनी बात कह सकते हैं और आप भी आवाज ऊँची करके अपनी बात कहने का मौका पाते हैं। ओमपुरी जैसे प्रतिभावान एक्टर को एक्टिंग की नई ऊँचाइयाँ छूने की वजह से खबरों में होना चाहिए था, टीवी पर दिए बयानों के कारण नहीं।
 
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें