अपने मां-बाप को देवता तुल्य समझकर उनकी पूजा करने वाले भारतीय समाज में भी अब बच्चों और उनके पालकों के बीच दूरियां बढ़ने लगी हैं। बुजुर्गों को शिकायत है कि बच्चों को उनकी फिक्र नहीं है तो बच्चों को शिकायत है कि मां-बाप उनकी परेशानी नहीं समझते। लेकिन इस क्षेत्र में काम करने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि दोनों पीढ़ियों के बीच का टकराव सिर्फ आपसी बातचीत की कमी का है। अगर बच्चे अपने मां-बाप के पास बैठकर उनसे प्यार की दो बात कर लें तो बहुत बड़ी समस्या सुलझ सकती है।
एज वेल फाउंडेशन के संस्थापक हिमांशु रथ ने कहा कि भारतीय समाज में ओल्ड एज होम का विचार सफल नहीं हो सकता। इसकी वैचारिक जड़ें इतनी गहरी हैं कि तमाम असहमतियों के बावजूद कोई बच्चा अपने मां-बाप को वृद्धाश्रम में नहीं छोड़ना चाहता। इसके आर्थिक कारण भी हैं क्योंकि एक बुजुर्ग को वृद्धाश्रम में रखने का खर्च कम से कम छ हजार रुपये प्रति महीना है, दवाओं का खर्च अलग से उठाना पड़ता है। यह राशि अभी भी सभी परिवारों के लिए उठा पाना संभव नहीं है। यही कारण है कि ढाई करोड़ से अधिक की आबादी वाले दिल्ली और एनसीआर में आज भी महज 48 वृद्धाश्रम हैं जबकि यहां बुजुर्गों की संख्या 30 लाख से अधिक है।
रथ के मुताबिक काम के दबाव में आज युवाओं के पास अपने माता-पिता के पास बैठकर बात करने का समय नहीं होता। वहीं बुजुर्गों के पास कोई काम न होने के कारण बहुत समय होता है जिसे वे समझ नहीं पाते कि कहां खर्च करें। इस स्थिति में दोनों के बीच तनाव पैदा हो जाता है। इस तनाव को आपसी बातचीत से कम किया जा सकता है।