राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल शनिवार को अपनी पुश्तैनी घर देखने उत्तराखंड पहुंचे थे। इस दौरान उन्होंने ऋषिकेश में आयोजित एक धार्मिक समारोह में शिरकत की और सभ्यता और आध्यात्मिक संदर्भ में अपनी बात रखी। मगर कुछ मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, एनएसए चीन और लद्दाख की स्थिति के संदर्भ में बोल रहे थे, ऐसा बताया गया।
इसी को लेकर रविवार को सरकारी अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि एनएसए का बयान चीन या किसी विशेष स्थिति से संबंधित नहीं था। अधिकारियों ने कहा कि डोभाल ऋषिकेश में किसी भी देश या विशेष स्थिति का जिक्र नहीं कर रहे थे, बल्कि वह शुद्ध रूप से सभ्यता और आध्यात्मिक संदर्भ में बोल रहे थे।
अधिकारियों ने कहा कि एनएसए के बयान को एक आध्यात्मिक संदर्भ में मोड़ने की कोशिश को अनसुना कर दिया गया क्योंकि वह चीन या पूर्वी लद्दाख क्षेत्र में जारी संघर्ष के बारे में नहीं बोल रहे थे।
अधिकारियों ने कहा कि कुछ मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, एनएसए चीन और लद्दाख की स्थिति के संदर्भ में बोल रहे थे। मगर हकीकत यह है कि डोभाल 24 अक्तूबर को ऋषिकेश के परमार्थ निकेतन आश्रम में थे। वहां, उन्होंने भारत के आध्यात्मिक शक्ति के बारे में वहां के भक्तों को संबोधित किया था। अपने संबोधन के दौरान उन्होंने स्वामी विवेकानंद का भी उल्लेख किया था।
एनएसए ने कहा था, 'आपने कहा कि हमने कभी किसी पर हमला नहीं किया है और इसके बारे में कई विचार हैं। अगर देश पर कोई खतरा है, तो हमें हमला करना चाहिए क्योंकि देश को बचाना महत्वपूर्ण है।'
उन्होंने कहा था, हम लड़ेंगे जहां आप हमसे लड़ना चाहते हैं, वह भी अनिवार्य नहीं है। हम लड़ते हैं जहां हमें लगता है कि खतरा आ रहा है। हमने स्वार्थी कारणों से ऐसा कभी नहीं किया है। हम अपनी जमीन और दूसरों की जमीन पर भी युद्ध लड़ेंगे लेकिन हमारे स्वार्थी कारणों से नहीं बल्कि दूसरों के सर्वोच्च भलाई के लिए।'
एनएसए ने सुझाव दिया कि राज्य भौतिक आयामों से बंधे हैं, लेकिन राष्ट्र एक भावनात्मक बंधन है, जो आध्यात्मिकता और संस्कृति के सामान्य धागे से बंधा है, जिसमें हमारे गुरुओं और आध्यात्मिक केंद्रों की गर्व की भावना है।