भारत-म्यांमार सीमा से लगे मणिपुर में नागरिकता और अवैध प्रवासन के सवाल पर विधानसभा का 1951 को राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के आधार वर्ष के तौर पर तय करने का फैसला दूरगामी असर वाला माना जा रहा है। इसका असर सिर्फ राज्य की नागरिकता संबंधी व्यवस्था तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूर्वोत्तर में अवैध प्रवासन, सीमा सुरक्षा और बदलती जनसांख्यिकी के मुद्दे पर राष्ट्रीय बहस को भी नई दिशा मिल सकती है।
क्या राज्य में एनआरसी के लिए केंद्र की अनुमति जरूरी?
सोमवार को मणिपुर विधानसभा ने एनआरसी के अद्यतन के लिए 1951 को आधार वर्ष तय करने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया। गृह मंत्री गोविंदास कोंथौजाम ने कहा कि अब राज्य सरकार प्रस्ताव के आधार पर केंद्र से आगे की प्रक्रिया के लिए मंजूरी मांगेगी। केंद्र की अनुमति के बिना राज्य में एनआरसी लागू नहीं किया जा सकता।
1951 के दस्तावेज तलाश रही सरकार
गृह मंत्री ने बताया कि सरकार 1951 के मूल एनआरसी दस्तावेज का पता लगा रही है। मणिपुर विधानसभा पहले पांच अगस्त 2022 और एक मार्च 2024 को भी एनआरसी अद्यतन का प्रस्ताव पारित कर चुकी है। दो सितंबर 2026 को सदन ने फिर इसे दोहराया था।
24,475 की पहचान 14,992 वापस भेजे
कोंथौजाम के अनुसार राज्य में अब तक 24,475 अवैध प्रवासियों की पहचान की गई है। इनमें चंदेल में 14,370, कामजोंग में 6,545 और तेंगनौपाल में 3,560 लोग शामिल हैं। इनमें से 14,992 को म्यांमार वापस भेजा जा चुका है। कामजोंग में 5,378 और चंदेल में 9,600 लोगों को वापस भेजा गया है। तेंगनौपाल में 3,560 में से केवल 14 को वापस भेजा गया।