असम में अवैध बांग्लादेशियों का मामला बहुत बड़ा मुद्दा रहा है। दरअसल, देश के बंटवारे के बाद उस समय के पूर्वी पाकिस्तान से बड़ी तादाद में अवैध प्रवासी असम में घुस आए। इसके बाद 1971 में बांग्लादेशी घुसपैठ ने असम की आबादी का स्वरूप बदल दिया।
धीरे-धीरे असम में मुस्लिमों और बांग्ला भाषी लोगों की तादाद बढ़ने लगी। इसके बाद पश्चिम बंगाल से भी बड़ी तादाद में लोग असम में जाकर बसने लगे। असम के मूल निवासियों ने आरोप लगाना शुरू कर दिया कि अवैध अप्रवासी उनके अवसरों को कम कर रहे हैं। यही नहीं बांग्लाभाषी स्थानीय लोगों पर हावी होते जा रहे हैं। अवैध अप्रवासियों के मुद्दे को लेकर असम में कई बार बड़े और हिंसक आंदोलन हुए हैं।
अगर सफल हुए तो सबसे बड़ा निर्वासन होगा
अगर केंद्र सरकार एनआरसी में अवैध ठहराये 40 लाख से ज्यादा लोगों को उनके देश वापस भेज पाती है तो यह दुनिया में अब तक का सबसे बड़ा निर्वासन होगा। इससे पहले किसी भी देश ने इतनी बड़ी तादाद में शरणार्थियों को अपने देश नहीं भेजा है।
1985 में प्रफुल्ल कुमार महंत के साथ असम समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले चार लोगों में आसू के महासचिव भृगु कुमार फूकन भी थे। राज्य में दिसंबर, 1985 में बनी अगप सरकार में वह गृह मंत्री बनाए गए। आपसी नाराजगी के कारण 1991 में फूकन ने महंत से अलग राह पकड़ ली और नूतन असम गण परिषद बनाई।
1994 में दोनों फिर साथ आए। फूकन को अगप का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया, लेकिन महंत से मतभेद सुलझ नहीं पाए और 1996 में वह फिर अलग हो गए। लगातार तीन बार विधायक रहे फूकन 2001 में राकांपा के टिकटपर चुनाव मैदान में उतरे, लेकिन हार गए। इसके बाद 2004 में वह अगप के टिकट पर गुवाहाटी से लोकसभा चुनाव में उतरे। इस बार भी उन्हें शिकस्त मिली। 20 मार्च, 2006 को दिल्ली के अस्पताल में पीलिया के इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई।