अधिकारी के अनुसार यह तकनीक बहुत खर्चीली नहीं है। यदि किसी कार में 15,000 जगहों पर कोड अंकित करना हो तो उसका खर्च महज सात से आठ डॉलर का आता है यानी पांच सौ रुपये में यह काम हो जाएगा। यदि किसी मोटरसाइकिल में कोड डालना हो, तो उसमें कार के मुकाबले बहुत कम जगह कोड डालना होगा, इसलिए खर्च कार के मुकाबले काफी कम हो जाएगा। यह तकनीक ऐसी है कि यदि कार में बम विस्फोट भी हो जाए, तो यह कोड नहीं मिटेगा।
पुलिस ही नहीं बीमा कंपनियों के लिए भी है उपयोगी
पुलिस के लिए चोरी के मामले सुलझाना आसान हो जाएगा। जब वाहन की चोरी नहीं होगी, तो बीमा कंपनियों से क्लेम भी कम होगा। यदि कोई चोर वाहन चोरी कर उसे मिटाने की भी कोशिश करेगा, तो उसे सफलता नहीं हो मिलेगी, क्योंकि 15,000 जगहों पर कोड ढूंढना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। चाहे कितनी भी कोशिश कर ली जाए, कहीं न कहीं कोड रह ही जाएगा।
इस तकनीक से कम लागत में नकली पुर्जों की पहचान आसानी से हो सकेगी। इसलिए मोटर वाहन के कल पुर्जे बनाने वाली कंपनियों के संगठन एक्मा ओपरमैन से संपर्क में है। उम्मीद है इस दिशा में शीघ्र ही फैसला लिया जाएगा।
अगले तीन महीने में पायलट परीक्षण हो सकता है शुरू
मंत्रालय के अधिकारी का कहना है कि यदि सब कुछ ठीक रहा तो अगले तीन महीने में इस तकनीक का पायलट परीक्षण शुरू हो सकता है। इसका दाम कौन देगा, इस सवाल पर उनका कहना है कि किसी कार की सुरक्षा के लिए पांच सौ रुपये की रकम कोई ज्यादा नहीं है। जब चोरी से सुरक्षा मिलेगी तो ग्राहक भी इसे आसानी से दे सकते हैं।