अपनी तरह से देश की विशेष सेवा करने वाले 'गोरिल्ला' आज खुद अपनी जिंदगी की लड़ाई लड़ रहे हैं। वे प्रधानमंत्री से लेकर राष्ट्रपति तक, सबसे अपनी जिंदगी की बेहतरी के लिए गुहार लगा रहे हैं, लेकिन व्यवस्था का आलम यह है कि कोई उनकी बात सुनने वाला नहीं है। यह स्थिति है उन पहाड़ी लोगों की जिन्हे पहले तो सरकार ने चीन से निबटने के लिए तैयार किया, लेकिन बाद में नीति बदल दी जिसके कारण इन पहाड़ी लोगों की जिंदगी मुश्किल हो गई। गुरिल्ला छाप युद्ध प्रणाली में ट्रेंड होने के कारण लोग स्थानीय लोग इन्हें 'गुरिल्ला सैनिक' या सिर्फ 'गुरिल्ला' ही कहते हैं।
दरअसल, ये गुरिल्ला सैनिक देश के सेना के जवानों की तरह अब तक देश की सेवा करते आए हैं। साल 1962 में जब भारत का चीन के साथ युद्ध हुआ, तब देश को इसमें मात मिली। चीन ने भारत के लगभग 45 हजार वर्ग किलोमीटर भूभाग पर कब्जा कर लिया। लेकिन चीन के विश्वासघाती हमले के बाद भारत सरकार ने यह फैसला लिया था कि चीन से सटी सीमाओं की लगातार निगरानी की जाए जिससे चीन कभी अचानक हमला न कर सके। सरकार और सेना ने योजना बनाई कि एक ऐसा सुरक्षा कवच तैयार किया जाए जो न सिर्फ क्षेत्र में चीन की हलचल पर नजर रख सके, बल्कि अचानक हमला होने की स्थिति में जवाबी कार्रवाई भी कर सके।
सरकार ने इस उद्देश्य के लिए चीन की सीमा से सटे क्षेत्रों में रह रहे पहाड़ी लोगों को सबसे उपयुक्त पाया। क्योंकि ये लोग इन्ही क्षेत्रों में रहते थे, वे पूरे भूभाग से परिचित थे, और उन ठंडे और पहाड़ी क्षेत्रों में रहने के अभ्यस्त थे। वे वीर और लड़ाकू प्रकृति के थे। वे हमेशा वहां रहकर सीमा की निगरानी कर सकते थे और जरुरत पड़ने पर चीनी सैनिकों से मुकाबला भी कर सकते थे। प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु की सरकार ने इसी योजना के तहत 1963 में स्पेशल सर्विस ब्यूरो (एसएसबी) का गठन किया। यह सीधे कैबिनेट अफेयर्स मंत्रालय के अधीन रहकर रॉ के निर्देश पर काम करता था। इस स्पेशल सर्विस ब्यूरो में सिर्फ स्थानीय पहाड़ी लोगों की ही भर्ती होती थी।
इस योजना के तहत चीन के सीमावर्ती राज्यों अरुणांचल प्रदेश उत्तराखंड, हिमाचल, सिक्किम और जम्मू-कश्मीर के सभी 18 वर्ष से ऊपर के सभी स्थानीय युवकों को रायफल चलाने की विशेष ट्रेनिंग दी गई। ट्रेनिंग के दौरान युवकों को छापामार युद्ध प्रणाली (गुरिल्ला वार फेयर) की भी विशेष ट्रेनिंग दी गई जिससे वे अचानक हुए हमलों के समय चीन को करारा जवाब दे सके। गुरिल्ला युद्ध नीति में कुशल इन युवकों को स्थानीय लोग 'गुरिल्ला' ही कहते थे। शांति के समय ये 'गुरिल्ला' युवक सर्किल ऑर्गनाइजर पद नाम के अधिकारी को चीनी गतिविधियों की जानकारी देते थे। इन ट्रेंड युवाओं में से बहुतों को सरकार एसएसबी में सेना के जवान की तरह पूर्णकालिक नौकरी पर रख लेती थी।
सरकार ने अपनी इस योजना को काफी सफल पाया। यही कारण है कि स्पेशल सर्विस ब्यूरो में 1963 से लेकर 2002 तक लगातार भर्ती होती रही। लेकिन 2002 में सरकार ने स्पेशल सर्विस ब्यूरो की जगह सशस्त्र सीमा बल को स्थापित करने का फैसला लिया। एसएसबी को पैरामिलिट्री बना दिया गया और इसकी भर्ती खुली कर दी गई। जबकि इसके पहले इसमें केवल स्थानीय पहाड़ी लोग ही भर्ती हुआ करते थे। लेकिन सरकार के इस फैसले के बाद स्पेशल सर्विस ब्यूरो में काम कर रहे लगभग एक लाख 'गुरिल्ला' बेकार हो गए।
बेकार हुए इन पहाड़ी गुरिल्ला युवकों का नेतृत्व कर रहे अल्मोड़ा के रहने वाले ब्रह्मानंद डालाकोटी ने अमर उजाला को बताया कि मणिपुर में स्पेशल सर्विस ब्यूरो की ही तर्ज पर विलेज वॉलुंटियर्स फोर्स (वीवीएफ) का गठन किया गया था। इस फोर्स को भी बाद में खत्म कर दिया गया, लेकिन इसके उस समय कार्यरत लगभग 799 वॉलुंटियर्स को सरकार ने सीमा सुरक्षा बल में परमानेंट नौकरी दे दी। उनका कहना है कि वीवीएफ की तरह उन्हें भी सीमा सुरक्षा बल के जवानों के रुप में नौकरी दी जाए।