ओडिशा के बालासोर में हुई रेल दुर्घटना के बाद भारतीय रेलवे ट्रेनों और मालगाड़ियों की सुरक्षा को लेकर सतर्क हो गया है। रेलवे ने समर्पित माल ढुलाई गलियारा डीएफसीसी (डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर) ने ट्रैक पर अत्याधुनिक टक्कर रोधी व्यवस्था 'कवच' लगाने की योजना बनाई है। डीएफसीसी का काम देख रहे अफसरों का कहना है कि ईस्टर्न-वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर का करीब करीब 77 फीसदी काम पूरा हो गया है। लेकिन अभी तक एक भी रूट पर कवच नेटवर्क नहीं लगाया गया है। क्योंकि रेलवे की पहली प्राथमिकता पैसेंजर ट्रेनों में कवच लगाने की है। इस समय कॉरिडोर पर मालगाड़ियों के दुर्घटना के मामले बहुत कम है। लेकिन फिर भी हम मालगाड़ियों की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। जल्द ही डीएफसीसी ट्रेक नेटवर्क पर भी कवच सिस्टम लगाया जाएगा।
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दरअसल, देश के अंदर माल ढुलाई के लिए अलग से रेलवे लाइन बिछाई जा रही है। इसे डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (डीएफसीसी) नाम दिया गया है। इसमें दो कॉरिडोर बन रहे हैं। पहला है ईस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर और दूसरा वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर कॉरिडोर है। ईस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर की लंबाई 1839 किलोमीटर रखी गई है। जबकि वेस्टर्न फ्रेट कॉरिडोर 1504 किलोमीटर है। ईस्टर्न कॉरिडोर पंजाब में साहनेवाल (लुधियाना) से शुरू होकर पश्चिम बंगाल तक जा रहा है, इसका अंतिम स्टेशन दनकुनी है। इस कॉरिडोर में कोयला खदानें, थर्मल पॉवर प्लांट और औद्योगिक शहर मौजूद हैं। जबकि वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर महाराष्ट्र के जवाहरलाल नेहरू पोर्ट टर्मिनल से उत्तर प्रदेश के दादरी तक तैयार हो रहा है। यह रेलवे लाइन प्रमुख बंदरगाहों से होकर गुजर रही है, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में यह लाइन बिछाई गई है।
रेलवे के लिए मालगाड़ियों की सुरक्षा भी बड़ी चुनौती
अमर उजाला से बातचीत में डीएफसीसी से जुड़े अफसरों का कहना है कि भारतीय रेलवे नेटवर्क में मालगाड़ियां अक्सर दुर्घटनाग्रस्त होती हैं, लेकिन इन्हें यात्री रेलगाड़ियों की तरह गंभीरता से नहीं लिया जाता है। वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर में वर्ष 2022 में ट्रेन से उतरने की दो घटनाएं हुई थीं। लेकिन यह बहुत ही छोटी घटनाएं थीं। लेकिन जब दोनों कॉरिडोर बनकर तैयार हो जाएंगे तो उसके बाद पूरी मालढुलाई इन्हीं दोनों कॉरिडोर से होने लगेगी। इससे नेटवर्क पर दबाव रहेगा और सुरक्षा को लेकर जोखिम ज्यादा होगा।
इस समय डीएफसीसी पर एक कर्मचारी की शिफ्ट आठ घंटे की होती है। रेलवे इसमें कमी लाने की योजना बना रहा है। ताकि रेल पायलटों की थकान की वजह से कोई दुर्घटना न हो। डीएफसीसी ने पश्चिमी कॉरिडोर में सुरक्षा के लिए लोको पायलटों को पैनिक बटन वाले हैंडसेट दिए हैं। दुर्घटना या ट्रेन के पटरी से उतरने की स्थिति में लोको पायलट बटन दबाएगा, जिससे उस इलाके की सभी ट्रेनों को रेट अलर्ट संदेश पहुंच जाएगा। इसके बाद कंट्रोल रूम दुर्घटना स्थल के आसपास की सभी ट्रेनों को रोक देगा।
ऐसे करता है कवच काम
इन दो कॉरिडोर से ये होगा फायदा
देश में बन रहे इन दो फ्रेट कॉरिडोर के निर्माण से मुख्य रेलवे लाइन से ट्रैफिक कम हो जाएगा। ऐसे में यात्री ट्रेनों की स्पीड बढ़ जाएगी और कम से कम समय में वह अपनी दूरी तय कर सकेंगी। इसके अलावा फ्रेट कॉरिडोर की रेलवे लाइन मालगाड़ी की स्पीड को 25 किमी प्रति घंटा से बढ़ाकर 75 किमी प्रति घंटा तक कर देगा। माल ढुलाई परिवहन में इजाफा होगा और मालगाड़ियां बिना किसी समस्या के कॉरिडोर पर दौड़ती रहेंगी। लगभग 70 फीसदी मालगाड़ी कॉरिडोर के ट्रैक पर दौड़ेंगी।