एक तरफ दिल्ली-एनसीआर में निर्माण की वजह से होने वाले भयानक प्रदूषण की रोकथाम के लिए सख्त निगरानी व नियंत्रण की बात हो रही है तो दूसरी ओर केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने अब देश में 50 हजार वर्ग मीटर तक की बड़ी निर्माण परियोजनाओं के लिए पर्यावरण मंजूरी की शर्त को खत्म कर दिया है। इतना ही नहीं, अब परियोजना प्रस्तावक को भवन या अन्य निर्माण परियोजना के लिए राज्य स्तरीय प्राधिकरण के बजाए जिला पंचायत और नगर निगम जैसे स्थानीय प्राधिकरण से ही कंपलीशन सर्टिफिकेट मिल जाएगा। पर्यावरणविद इन नए प्रावधानों को पर्यावरण के लिए बड़ी क्षति बता रहे हैं।
मंत्रालय की ओर से 14 और 15 नवंबर को संशोधित अधिसूचनाएं जारी की गई हैं। इससे पहले पर्यावरण प्रभाव आकलन, 2006 अधिसूचना के प्रावधानों के तहत 20 से 50 हजार वर्ग मीटर तक के भवन और अन्य निर्माण परियोजनाओं के लिए परियोजना प्रस्तावक को पहले पर्यावरणीय प्रभाव अध्ययन कराना पड़ता था। इसके बाद पर्यावरण मंत्रालय की ओर से गठित राज्य स्तरीय पर्यावरण प्रभाव आकलन समिति सभी बिंदुओं को तय करने के बाद ही परियोजना पर पर्यावरण मंजूरी देने या न देने का निर्णय लेती थी। अब बिना पर्यावरण अध्ययन कराए स्थानीय प्राधिकरण को ही इन विषयों का सर्वेसर्वा बना दिया गया है।
बड़ी शर्त खत्म कर, जोड़ी गईं हैं नई शर्तें
नई अधिसूचना के मुताबिक, सभी भवन एवं निर्माण के लिए बड़ी शर्त को खत्म कर नई पर्यावरणीय शर्तें जोड़ी गई हैं। इनमें कहा गया है कि 20 से 1.5 लाख वर्ग मीटर तक की परियोजनाओं में शैक्षणिक संस्थान, औद्योगिक शैक्षणिक संस्थान, अस्पताल शेडों, छात्रावास जैसी परियोजनाएं आदि शामिल होंगे। वहीं सभी निर्माण भवन, विकास परियोजनाएं, अस्पताल, शैक्षणिक भवन निर्माण आदि को हरित क्षेत्र प्रबंधन, अपशिष्ट और ठोस कचरा प्रबंधन, वायु और जल प्रदूषण प्रबंधन, ऊर्जा, परिवहन, मृदा संरक्षण जैसे मुद्दों पर तय की गईं शर्तों को मानना होगा। इन शर्तों के पालन को सुनिश्चित कराने और निगरानी का काम व शक्ति नगर पालिका, विकास प्राधिकरण और जिला पंचायत को दे दिया गया है।
पर्यावरण के जानकार नहीं तो कैसे लेंगे स्थानीय प्राधिकरण निर्णय
पर्यावरणविद ऋत्विक दत्ता ने बताया कि ये शर्तें निष्प्रभावी हैं। मसलन स्थानीय प्राधिकरण पर्यावरणीय मामलों के जानकार नहीं होते हैं, ऐसे में वे पर्यावरणीय बिंदु पर फैसला कैसे करेंगे। पर्यावरण प्रभाव आकलन, 2006 अधिसूचना के प्रावधानों को कमजोर बनाया जा रहा है। इसे कानूनी चुनौती दी जाएगी।
पर्यावरण को क्षति पहुंचाएगी यह अधिसूचना
पर्यावरणविद एवं कानूनविद राहुल चौधरी ने कहा कि देश में निर्माण के कारण होने वाला प्रदूषण एक बड़ी चुनौती बन चुका है। ऐसे में जरूरत है कि निर्माण क्षेत्र सख्त निगरानी और नियंत्रण में रहे। उन्होंने कहा कि पर्यावरण मंत्रालय की नई अधिसूचना न सिर्फ पर्यावरण को क्षति पहुंचाएगी बल्कि एनजीटी के आदेश की मूलभावना के खिलाफ भी हैं।
एनजीटी ने हाल ही में रद्द की थी एक अन्य अधिसूचना
हाल ही में एनजीटी ने पर्यावरण मंत्रालय की ओर से जारी उस अधिसूचना को रद्द कर दिया था जिसमें 1.5 लाख वर्ग मीटर तक की निर्माण परियोजनाओं के लिए पूर्व में हासिल की जाने वाली पर्यावरण मंजूरी का प्रावधान खत्म कर दिया गया था। एनजीटी का कहना था कि पर्यावरण मंजूरी की शर्त को ध्यान में रखा जाना चाहिए।