प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में छिपे काले धन को बाहर निकालने के नाम पर पुराने 1000 और 500 रुपये के नोटों को चलन से बाहर करने के लिए नोटबंदी का जो कदम उठाया उसकी 50 दिन की समयावधि बीत चुकी है। लेकिन मोदी सरकार के इस बड़े फैसले की अग्निपरीक्षा अब पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में होनी है।
दिल्ली में दो दिन हुई भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में नोटबंदी को भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़ा चुनावी मुद्दा बना कर चुनावी मैदान में उतरने का फैसला किया गया है। भाजपा इसे अमीर गरीब की लड़ाई बनाकर अपना नया सामाजिक आर्थिक जनाधार बनाकर यह चुनावी महाभारत जीतना चाहती है।
मोदी के इस फैसले केआर्थिक नतीजों पर अर्थशास्त्री अपने अपने विश्लेषण दे चुके हैं। लेकिन इसका राजनीतिक विश्लेषण भी उतना ही जरूरी है क्योंकि मोदी का यह फैसला आर्थिक से ज्यादा एक बड़ा राजनीतिक कदम है, जिसकी तुलना विश्वनाथ प्रताप सिंह के मंडल कार्ड से भी की जा सकती है। मोदी के इस आर्थिक मंडल कार्ड की परीक्षा जल्दी ही पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में होने जा रही है।
नोटबंदी केआर्थिक नतीजे जो भी हों लेकिन अपने इस कदम से नरेंद्र मोदी ने एक बड़ा सियासी दांव खेला है जो अगर कामयाब हुआ तो वह आजादी के बाद की राजनीति के महानायक साबित होंगे और अगर यह दांव उल्टा पड़ गया तो मोदी राजनीति केसबसे बड़े खलनायक बन जाएंगे।
नोटबंदी तय करेगी मोदी और बीजेपी का भविष्य
अपने इस दांव के जरिए मोदी ने देश की राजनीति का नया ध्रुवीकरण करने की कोशिश की है। संघ परिवार और भाजपा की मंदिर राजनीति ने देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण किया तो विश्वनाथ प्रताप सिंह और तीसरे मोर्चे के नेताओं की मंडल राजनीति ने जातीय ध्रुवीकरण को अपना सियासी हथियार बनाया। अस्सी और नब्बे के दशक की सियासत से जन्में इन दोनों तरह के सामाजिक ध्रुवीकरण की राजनीति का रस खासा निचोड़ा जा चुका है। हिंदुत्व के नाम पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की सियासत को सामाजिक न्याय के नाम पर जातीय ध्रुवीकरण के हथियार से काटने की कोशिश उत्तर प्रदेश और बिहार में लगातार हुई। कभी हिंदुत्व की राजनीति जीती तो कभी सामाजिक न्याय की सियासत ने उसे पटखनी दी।
2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की जबर्दस्त जीत की बुनियाद में हिंदुत्व की सीमेंट के साथ साथ जातीय समीकरण की इंटें भी थीं। ऊपर विकास का पलस्तर और सुशासन का पेंट था। लोकसभा चुनावों के छह महीने के भीतर हुए महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड और जम्मू कश्मीर केचुनावों में भाजपा को जबर्दस्त सफलता मिली। लेकिन फरवरी 2015 में हुए दिल्ली विधानसभा के चुनावों में न हिंदुत्व की राजनीति चली, न मोदी के विकास और सुशासन का जादू चला और भाजपा महज तीन सीटोंं पर सिमट कर रह गई। इसके बाद अक्टूबर नवंबर में हुए बिहार विधानसभा चुनावों में भाजपा ने मोदी केअति पिछड़े वर्ग से होने केनाम पर जातीय ध्रुवीकरण, गोवध बंदी के नारे के जरिए हिंदुत्व की राजनीति और मोदी के बिहार पैकेज से विकास की राजनीति का एक काकटेल बनाया लेकिन नीतीश लालू और कांग्रेस के महागठबंधन के हाथों भाजपा को करारी हार मिली।
इन नतीजों ने नरेंद्र मोदी को यह समझा दिया कि हिंदुत्व, विकास, सुशासन और जातीय ध्रुवीकरण की राजनीति की धार अब कमजोर होती जा रही है। जबकि फरवरी मार्च 2017 में होने वाले उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर विधानसभा के चुनावों की कठिन चुनौती भाजपा के सामने है। दिल्ली और बिहार की करारी हार के बावजूद आने वाले सभी चुनावों में भाजपा को सबसे ज्यादा मोदी के चेहरे और करिश्मे का ही भरोसा है।
खुद नरेंद्र मोदी जानते हैं कि पार्टी अब संगठन केंद्रित न होकर व्यक्ति केंद्रित हो गई है और उसका बेड़ा पार लगाने की जिम्मेदारी उनके ही कंधों पर है। आने वाले उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर के विधानसभा चुनावों में भी भाजपा नरेंद्र मोदी की छवि और लोकप्रियता केसहारे ही चुनाव लड़ रही है। इन चुनावों में भाजपा अगर हारती है तो न सिर्फ पार्टी और सरकार का बल्कि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चमक फीकी पड़ेगी और इकबाल कमजोर होगा। लेकिन अगर चुनाव में उसे कामयाबी मिलती है तो न सिर्फ मोदी की ताकत सरकार और पार्टी में बढ़ेगी बल्कि नोटबंदी के उनके फैसले पर जनता की मुहर भी लग जाएगी। इसलिए भाजपा इन चुनावों में नोटबंदी को अपने एक बड़े मुद्दे के रूप में जनता के बीच ले जाने की तैयारी कर रही है। दिल्ली में हुई उसकी दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के आर्थिक प्रस्ताव में नोटबंदी सबसे बड़ा और प्रमुख मुद्दे रूप में प्रस्तुत किया गया।
नोटबंदी से मोदी ने खेला आर्थिक ध्रुवीकरण का दांव
दरअसल, मोदी एक नए सियासी ब्रह्मास्त्र की तलाश में थे। पहले पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में घुसकर सेना की सर्जिकल स्टा्रइक को मुद्दा बनाकर हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के नए सियासी पैकेज के साथ उतरने की तैयारी थी। लेकिन सेना की कार्रवाई केसियासी इस्तेमाल को लेकर विपक्षी शोरशराबे के बाद इस रणनीति को बदलना पड़ा। सियासी समर के धनी नरेंद्र मोदी ने इसकेबाद अचानक नोटबंदी का बड़ा और कड़ा फैसला लेकर देश की राजनीति और अर्थव्यवस्था दोनों में भूचाल ला दिया है।
आठ नवंबर को उनकी घोषणा के बाद से ही देश के सारे मुद्दे नेपथ्य में चले गए। अब पाकिस्तान के साथ सीमा पर हो रही गोलीबारी और आतंकवादी हमलों में मारे जाने वाले जवानों की शहादत, कथित गो रक्षकों के दलितों और मुसलमानों पर होने वाले हमलों, विदेशी बैंकों मेंं जमा काले धन की वापसी, अयोध्या में राम मंदिर निर्माण और समान नागरिक संहिंता, चुनावी वादे केमुताबिक प्रति वर्ष दो करोड़ रोजगार सृजन , उद्योग और व्यापार जगत में छाई मंदी, किसानों को फसल केलाभकारी और लागत से 50 फीसदी ज्यादा न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसे तमाम मुद्दों पर देश में कोई चर्चा ही नहीं है। चर्चा है सिर्फ नोटबंदी और उसके जरिए बैंकों में जमा होने वाले छिपे धन की और बैंकों के सामने लगने वाली लंबी कतारों की।
अपने इस कदम से नरेंद्र मोदी ने एक नए तरह के ध्रुवीकरण का राजनीतिक दांव खेला है। यह है आर्थिक ध्रुवीकरण का। हिंदू मुसलमान और सवर्ण अवर्ण के सामाजिक ध्रुवीकरण से आगे गरीब और अमीर केध्रुवीकरण की राजनीति का जुआ प्रधानमंत्री मोदी ने खेला है जो कभी इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ के नारे, प्रिवी पर्स के खात्मे और बैंको के राष्ट्रीयकरण के जरिए खेला था और उन्हें जबर्दस्त सियासी कामयाबी हासिल हुई थी। मोदी अब वही दांव खेल रहे हैं। वह नोटबंदी के जरिए खुद को गरीबों का मसीहा साबित करना चाहते हैं जो अमीरों के काले धन को उनकी तिजोरियोंं से निकालकर बैंकों में जमा करवाकर देश की आर्थिक हालत सुधारकर जन कल्याण के काम करना चाहता है।नोटबंदी के अपने ऐलान से लेकर अपनी हर जनसभा में मोदी लगातार यही कहा कि वह देश के गरीबों के साथ खड़े हैं। यहां तक कि उन्होंने एक जनसभा में अपनी जान पर खतरा तक बताते हुए बेहद भावुक भाषण भी दिया।
उधर विपक्ष नोटबंदी पर संसद में प्रधानमंत्री से अपने सवालों के जवाब मांगता रहा, लेकिन मोदी संसद की बजाय अपनी जनसभाओं और रेडिया कार्यक्रम मन की बात के जरिए सीधे देश की जनता को संबोधित कर रहे हैं। एक तरह से उनकी यह कोशिश भी है कि वह जनप्रतिनिधियों की बजाय सीधे जन से ही बात करेंगे। नोटबंदी का विरोध और उस पर सवाल उठाने वाले विपक्ष और दूसरे लोगों को मोदी ने सीधे सीधे काले धन और उन अमीरोंं के पक्ष मेंं खड़ा बताया है जो देश की अर्थव्यवस्था में काले धन के कारोबारी हैं। मोदी ने यहां तक आरोप भी लगा दिया कि नोटबंदी पर ऐतराज जताने वाले इसलिए परेशान हैं कि उन्हें अगर पहले से पता होता तो वह अपना कालाधन ठिकाने लगा देते।
बीजेपी को मिलेगी नोटबंदी का सियासी फायदा !
इस तरह मोदी ने देश को सांप्रदायिक और जातीय ध्रुवीकरण की राजनीति से निकालकर आर्थिक ध्रुवीकरण की नई राजनीति में ले जाने की कोशिश की है। उन्हें और उनके सलाहकारों को भरोसा है कि भले ही आम लोगों को अभी शुरुआती तकलीफ हो रही हो,लेकिन उन्हें प्रधानमंत्री के इस कदम के दूरगामी देशहित मेंं होने का भरोसा है, इसलिए लोग मोदी को एक राष्ट्र नायक के रूप में देखने लगे हैं। मोदी के बेहद करीबी माने जाने वाले एक प्रमुख केंद्रीय मंत्री के मुताबिक इसका तत्काल सियासी लाभ उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब और गोआ विधानसभा चुनावों में तो मिलेगा ही, और जैसे जैसे बैंकों में नई मुद्रा आती जाएगी और लाइनें खत्म होती जाएँगी तब इसका बड़ा फायदा 2019 के लोकसभा चुनावों मेंं उसी तरह मिलेगा जैसे कि इंदिरा गांधी को गरीबी हटाओ के नारे और बांगलादेश युद्ध के बाद 1972 के लोकसभा चुनावों में मिला था।
लेकिन मोदी के सामने यह जोखिम भी है कि जिस तरह नकदी संकट ने तमाम छोटे मझोले उद्योगों और व्यापार और निर्माण कार्यों को ठप्प कर दिया है और बड़े उद्योगों का उत्पादन भी घट गया है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खेती किसानी में जिस तरह का गंभीर संकट सामने आ रहा है उससे अर्थव्यवस्था की भावी तस्वीर बेहद भयावह नजर आने लगी है। विकास दर में गिरावट केअनुमान आ रहे हैं, अगर इस पर समय रहते काबू नहीं पाया गया और मंदी और मुद्रा अवस्फीति आम लोगों की परेशानी बेहद बढ़ा देगी। तब मोदी और उनके सलाहकारों के लिए हालात संभालना बेहद मुश्किल हो जाएगा, जिसका सियासी नतीजा उनके लिए बेहद नुकसानदेह भी हो सकता है।
क्योंकि इंदिरा गांधी के गरीबी हटाओ के नारे से किसी आम आदमी के घर का बज़ट नहीं बिगड़ा और चूल्हा नहीं बंद हुआ। उनकेप्रिवी पर्स के खात्में ने कुछ राज परिवारों के हितों पर चोट की थी और आम लोगों में इंदिरा की छवि एक गरीब समर्थक नेता की बनी। जबकि नोटबंदी से उत्पन्न नकदी संकट ने रोजगार और आम आदमी के जीवन को बेहद बुरी तरह प्रभावित किया है। इसलिए नोटबंदी नरेंद्र मोदी के लिए शेर की सवारी है कि अगर शेर को काबू कर लिया तो उनकी वाह वाह होगी वरना शेर का शिकार बनने का भी पूरा खतरा है।