आर्य-द्रविड़ बहस को संबोधित करते हुए तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि ने कहा, 'इससे पहले कभी भी 'आर्यन' को नस्ल के रूप में नहीं देखा गया था। हमारे किसी भी साहित्य में, चाहे संगम हो या वैदिक, 'आर्यन' शब्द को नस्ल के रूप में इस्तेमाल नहीं किया गया है।
तमिलनाडु के राज्यपाल आर. एन. रवि ने सोमवार को चेन्नई के डीजी वैश्य कॉलेज में आयोजित 'सिंधु सभ्यता: इसकी संस्कृति और लोग - पुरातात्विक दृष्टिकोण' नाम के राष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लिया। इस दो दिवसीय सम्मेलन का आयोजन दक्षिण भारतीय अध्ययन केंद्र ने किया था।
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आर्य शब्द का मतलब बिल्कुल अलग है- राज्यपाल
अपने भाषण में राज्यपाल आर. एन. रवि ने आर्य-द्रविड़ विवाद पर कहा, 'हमारे किसी भी प्राचीन साहित्य में 'आर्य' शब्द को नस्ल के रूप में नहीं बताया गया है। न ही संगम साहित्य में, न ही वैदिक ग्रंथों में, कहीं भी आर्य शब्द को जाति के रूप में प्रयोग नहीं किया गया। 2,000 से अधिक वर्षों के हमारे ग्रंथों में आर्य शब्द का मतलब बिल्कुल अलग है। लेकिन पिछले 60-70 वर्षों में एक अलग विचारधारा बनाई गई, जिसमें आर्यों को एक अलग नस्ल के रूप में दिखाया गया और आर्य आक्रमण का प्रचार किया गया।'
'इतिहास की सच्चाई को फिर से परखना चाहिए'
राज्यपाल आर.एन. रवि ने यह भी कहा कि यूरोपियनों ने अपने साम्राज्यवादी विचारों को सही ठहराने के लिए 'आर्य नस्ल' का सिद्धांत गढ़ा। उन्होंने आगे कहा कि, 'आर्यन और द्रविड़ को अलग-अलग नस्लों के रूप में बताना झूठ है। सरस्वती-सिंधु सभ्यता का ऐतिहासिक सच सामने आना चाहिए। क्या हम सिंधु सभ्यता को सरस्वती सभ्यता कह सकते हैं? क्या ऐसा किया जा सकता है?'
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पेरियार ने आर्यों को बर्बर बताया- राज्यपाल
राज्यपाल आर. एन. रवि ने समाज सुधारक ई.वी. रामासामी नायकर (पेरियार) की किताबों का जिक्र करते हुए कहा कि 'पेरियार ने आर्यों को बर्बर बताया और कहा कि वे नशे में धुत होकर भारत आए थे, नाच-गाना करते थे, और उन्होंने रामायण-महाभारत की कल्पना कर ली।' उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारतीय सभ्यता को बाहरी प्रभावों से बचाने की जरूरत है और हमें अपने इतिहास को सही परिप्रेक्ष्य में समझने का प्रयास करना चाहिए।