दुनिया की सबसे बड़ी सरकारी योजना की तैयारी कागजों पर नहीं
इतना ही नहीं, दो साल पहले वर्ष 2016-17 के बजट में भी वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इस तरह की योजना को लाने और लोगों को एक लाख रुपये का बीमा देने का ऐलान किया था, जबकि जमीनी स्तर पर गरीब मरीजों को केवल 30 हजार रुपये तक स्वास्थ्य लाभ ही मिल सका। ठीक इसी तरह हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर को भी पिछले साल बजट में पेश किया था। लेकिन काम अभी तक नहीं हुआ।
न मंत्रालय की तैयारी और न टीबी को मिला पर्याप्त बजट
इन्हीं के चलते दुनिया की सबसे बड़ी सरकारी योजना की राह में रोड़े हजार दिख रहे हैं। हालात यह हैं कि इसे लेकर जबाव केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के पास भी मौजूद नहीं है। कहा जा रहा है कि इस पर जल्द ही पूरी प्रक्रिया देश केसामने लाएंगे।
छह महीने में ही बंट जाएगा टीबी का बजट, जरूरत 9 महीने की
खुद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा भी जबाव देने में असहज महसूस हुए। शुक्रवार को निर्माण भवन में पत्रकारों के सवालों पर उन्होंने कहा कि आयुष्मान भारत योजना ऐतिहासिक और स्वास्थ्य के लिहाज से क्रांतिकारी योजना है। नमो केयर का हवाला देते हुए उन्होंने पीएम मोदी का आभार भी जताया। लेकिन जो सुविधा बीते वर्षों में न मिली, वह अब कैसे मिलेगी? इस पर बाद में जबाव देने की बात कही।
तैयारी में लगेगा वक्त
स्वास्थ्य मंत्रालय के सूत्र बताते हैं कि इस योजना को लागू करने के अलावा लाभार्थियों की पहचान, रजिस्ट्रेशन, कार्ड उपलब्ध करवाने से लेकर अन्य तमाम प्रक्रियाओं को पूरा करने में वक्त लग सकता है। इसके अलावा बीमा के लिए निजी कंपनियां या फिर ट्रस्ट में से किसका चुनाव किया जा सकता है? इस पर भी फिलहाल कोई निर्णय नहीं हुआ है।
कैशलेस पर बड़ा सकंट
करोड़ों लोगों को बीमा का लाभ कैशलेस के जरिए मिलेगा या नहीं? इसके बारे में फिलहाल केंद्रीय मंत्री नड्डा ने पल्ला झाड़ा है। लेकिन अधिकारियों की मानें तो कैशलेस पर बड़ा सकंट खड़ा हो सकता है। देश के बड़े प्राइवेट अस्पताल इसे नामंजूर भी कर सकते हैं। इसके पीछे सरकारी कर्मचारियों को मिलने वाली स्वास्थ्य सुविधाओं को बताया जा रहा है। जिनका खर्चा अस्पतालों को समय पर नहीं मिल पाता। उधर, अब तक सरकार अपनी योजनाओं के तहत सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों पर बजट खर्च करती थी। लेकिन बीमा की वजह से सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के उपेक्षित होने और मुनाफाखोरी बढने की आशंका जताई जा रही हैं।
छह महीने में खत्म होगा टीबी का बजट
टीबी मरीजों को पोषक आहार के रुप में हर माह 500 रुपये मिलेंगे। ताकि इसके कारण वे 9 महीने तक अपना कोर्स पूरा कर सकेंगे। इस पर सरकार 600 करोड़ रुपये खर्च भी करेगी। लेकिन आंकड़ों पर गौर करें तो यह बजट महज 6 महीने में ही खत्म हो जाएगा। चूंकि देश में टीबी मरीजों की तादाद 24 लाख से ऊपर है। प्रति महीने मरीजों को 120 करोड़ रुपये का खर्चा आएगा। जबकि कोर्स नौ महीने तक चलने वाला है। मंत्रालय के ही अधिकारियों का कहना है कि ये बजट छह महीने में खत्म हो जाएगा। सवाल लाजमी है कि शेष तीन महीने मरीजों को पौषक आहार किस तरह से मिलेगा?