सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अलग धार्मिक पहचान किसी व्यक्ति पर हमला करने या उसकी हत्या करने का ‘लाइसेंस’ नहीं दे देती है। शीर्ष अदालत ने सभी अदालतों से कहा कि वे ऐसा कोई आदेश पारित न करें जिसमें किसी समुदाय के समर्थन या विरोध का स्वर दिखता हो।
शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी बांबे हाईकोर्ट के उस आदेश पर की है जिसमें एक व्यक्ति की नृशंस हत्या के मामले में
हिंदू राष्ट्र सेना के तीन लोगों को जमानत देते हुए यह तर्क दिया गया था कि पीड़ित का दोष सिर्फ यह था कि वह दूसरे धर्म का था। हाईकोर्ट के इस तर्क पर कड़ी आपत्ति जताते हुए शीर्ष अदालत ने तीनों आरोपियों की जमानत रद्द कर दी है।
न्यायमूर्ति एसए बोबडे और न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव की पीठ ने कहा कि सभी अदालतों को हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि भारत में विभिन्न समुदाय और मान्यता वाले लोग रहते हैं। ऐसे में अदालतों का यह कर्तव्य है कि वह विभिन्न समुदायों या समूहों के अधिकारों पर निष्पक्ष तरीके से निर्णय ले।
ऐसी कोई टिप्पणी नहीं करें जो किसी समुदाय के खिलाफ हो या समर्थन में। साथ ही शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट से आरोपियों की जमानत याचिकाओं की नए सिरे से जांच करने का निर्देश दिया है। हाईकोर्ट को छह हफ्ते में जमानत याचिकाओं का निपटारा करने के लिए कहा गया है।