इस वर्ष मार्च के महीने में औसत से छह डिग्री से ज्यादा की असामान्य बढ़ोतरी देखी गई। इस कारण नींबू की फसल में फूल लगने की प्रक्रिया अचानक तेज हो गई, लेकिन जल्दी ही ये फूल गिरने लगे और पेड़ों पर बहुत कम फल रह गए। इसका पूरे देश में नींबू उत्पादन पर असर पड़ सकता है और नींबू की कीमतों में कमी नहीं आ सकती है। इसी प्रकार उत्तर भारत में आम की अगेती फसलों के पेड़ों पर भी फरवरी-मार्च के महीनों में ही बौर लगते हैं, लेकिन तापमान बढ़ने से ये बौर गिरने लगे। इससे आम की अगेती फसलों के उत्पादन में एक तिहाई तक की कमी आ सकती है, आम के बौर भी बहुत कम पेड़ों पर लगे हैं जिसके कारण बाजार में इनकी कीमतें ऊंची रह सकती हैं।
क्यों कम हुआ उत्पादन?
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान में वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. संजय सिंह ने अमर उजाला को बताया कि आम और नींबू की फसलों के उत्पादन में एक तिहाई तक की गिरावट होने की संभावना है। इससे बाजार में इनकी कीमतें बहुत ज्यादा बनी रह सकती हैं। आम की पिछेती फसलों का उत्पादन संभल गया तो बाद में आम की कीमतों में कुछ कमी आ सकती है, लेकिन आम की पिछेती फसलों को बीमारियों और मौसम के प्रतिकूल प्रभाव से बचाने की चुनौती ज्यादा रहेगी।
डॉ. संजय सिंह ने बताया कि अचानक तापमान बढ़ने के कारण फरवरी-मार्च के दौरान वातावरण में मधुमक्खी, घरेलू मक्खी और अन्य कीट-पतंगों की संख्या कम हो गई थी। इससे आम, नींबू और गेहूं जैसी फसलों के परागण में भी कमी आई है। इससे फूल लगने और फलों के उत्पादन पर असर पड़ा है। जिन पेड़ों पर बौर लगे हैं, उन पर भी बौर झड़ने लगे हैं क्योंकि उनमें गुच्छा रोग लग गया है। ये विशेष प्रकार की बीमारी होती है जिसमें बौर खिले होने की बजाय गुच्छे के रूप में इकट्ठे हो जाते हैं, रोग लगने के बाद इनमें फल नहीं लगता।
उतर भारत के वातावरण में फरवरी से मार्च तक का समय बसंत के रूप में जाना जाता है। इस दौरान न तो बहुत ज्यादा गर्मी होती है और न ही बहुत ज्यादा ठंडक होती है। इसी समय में गेहूं की फसल में बीज लगते हैं और उसमें दूध भरता है जो बाद में गेहूं के गूदे के रूप में विकसित होता है, लेकिन इस वर्ष मार्च के महीने में अचानक तेजी से तापमान बढ़ा, जिसके कारण फसलों में दूध लगने की मात्रा में गिरावट आ गई। इससे प्रति हेक्टेअर खेत में अपेक्षाकृत कम उत्पादन होगा। उत्पादित फसल की क्वालिटी कमजोर रहेगी जिसका असर विदेशों को होने वाले गेहूं निर्यात पर भी पड़ सकता है।
पछेती फसलों को बचाएं किसान
आम की पछेती फसलों को गुच्छा रोग लगने से बचाने की कोशिश की जा सकती है। इसके लिए मौसम में बदली छाए रहने पर किसानों को कॉन्फोडोर की एक मिलीलीटर दवा तीन लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए। बहुत ज्यादा फसल गिरने की स्थिति में 24D 5DPM की दवा पांच मिली ग्राम लेकर एक लीटर में घोल बनाकर बौर पर छिड़काव करना चाहिए। फलों को गिरने से बचाने के लिए प्लेनोफिक्स दवा को 10 पीपीएम के अनुसार छिड़काव किया जाना चाहिए।