मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ के नेतृत्व में पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता मोहम्मद अकबर लोन की ओर से पेश वकील कपिल सिब्बल से कहा, आप ब्रेग्जिट जैसी जैसी स्थिति की कल्पना नहीं कर सकते। यह एक राजनीतिक फैसला है, जो तत्कालीन सरकार की ओर से लिया गया था। हमारे जैसे संविधान के भीतर जनमत संग्रह का कोई सवाल ही नहीं है।
सुनवाई के दौरान सिब्बल ने ब्रेग्जिट का उदाहरण दिया था, जहां जनमत संग्रह कराया गया था जबकि जनमत संग्रह की मांग करने वाला कोई संवैधानिक प्रावधान वहां नहीं था। उन्होंने कहा, किसी भी रिश्ते को तोड़ने से पहले लोगों की राय जरूर लेनी चाहिए क्योंकि फैसले के केंद्र में लोग ही होते हैं। इस पर पीठ ने कहा, जब तक लोकतंत्र मौजूद है, लोगों की इच्छा स्थापित संस्थानों की ओर से ही व्यक्त की जानी चाहिए।
सिब्बल ने सवाल किया, क्या सरकार लोगों से परामर्श किए बिना किसी राज्य का दर्जा बदल सकती है। अगर उनके पास बहुमत है तो इसका मतलब यह नहीं कि वे जो चाहें करें। जम्मू-कश्मीर के लोगों की आवाज कहां है? प्रतिनिधि सरकार की आवाज कहां है? पांच साल बीत गए। वे सहमति नहीं लेते, उनकी राय भी नहीं लेते। हम कहां खड़े हैं? संविधान एक राजनीतिक दस्तावेज है लेकिन आप इसका राजनीतिक दुरुपयोग और पैंतरेबाजी के लिए नहीं कर सकते।
हमें उम्मीद अदालत चुप नहीं रहेगी
सिब्बल ने कहा, हमें उम्मीद है कि अदालत चुप नहीं रहेगी क्योंकि यह एक ऐतिहासिक क्षण है। सरकार और जम्मू-कश्मीर के बीच संबंध पूरी तरह से संघीय है और अन्य राज्यों की तरह अर्ध संघीय नहीं है। उन्होंने केंद्र सरकार पर अनुच्छेद 370 (3) में बदलाव करने, अनुच्छेद 370 को निष्क्रिय घोषित करने से पहले जम्मू-कश्मीर संविधान सभा (अब निष्क्रिय) की सिफारिश प्राप्त करने की पूर्व शर्त को दरकिनार करके संविधान से धोखाधड़ी का आरोप लगाया। उन्होंने यह भी कहा कि संविधान सभा की कार्यवाही यह निर्धारित करने के लिए जरूरी थी कि क्या अनुच्छेद 370 एक अस्थायी उपाय था। सिब्बल ने दलील दी कि निरस्तीकरण एक राजनीतिक निर्णय था और जम्मू-कश्मीर के लोगों की राय मांगी जानी चाहिए थी।
सवाल यह है कि संविधान यह अधिकार देता है या नहीं: पीठ
पीठ ने सिब्बल से पूछा, फिर सवाल यह है कि संविधान यह अधिकार देता है या नहीं। सिब्बल ने जोर देकर कहा, निरस्तीकरण एक राजनीतिक कृत्य था और अनुच्छेद 370 एक अस्थायी प्रावधान है या नहीं, यह कोई मुद्दा नहीं है और जम्मू-कश्मीर के लोगों की राय मांगी जानी चाहिए थी। सुनवाई बुधवार को भी जारी रहेगी।
सिब्बल ने पूर्व सीजेआई के बयान का हवाला दिया
सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई के राज्यसभा में सोमवार को दिए बयान का हवाला दिया। सिब्बल ने पीठ से कहा, आपके एक सम्मानित सहयोगी (पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई) ने भी कहा है कि वास्तव में बुनियादी संरचना सिद्धांत भी संदिग्ध है। इस पर सीजेआई ने एक पल रुकने के बाद कहा, मिस्टर सिब्बल, जब आप किसी सहकर्मी का जिक्र करते हैं, तो आपको मौजूदा सहयोगी का जिक्र करना होगा। एक बार जब हम जज नहीं रह जाते तो हम जो भी कहते हैं, वह सिर्फ एक राय है, बाध्यकारी नहीं।
संसद की कार्यवाही पर अदालत में चर्चा नहीं हो सकती: मेहता
सिब्बल के राज्यसभा में दिए बयान का हवाला देने पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने हस्तक्षेप करते हुए कहा, संसद की कार्यवाही पर अदालत के समक्ष चर्चा नहीं की जा सकती। संसद भी इस बात पर चर्चा नहीं करती कि अदालतों में क्या चल रहा है। सिब्बल इस बयान पर यहां चर्चा कर रहे हैं क्योंकि वह कल संसद में नहीं थे। आपको संसद में इसका जवाब देना चाहिए था। मार्च 2020 में राज्यसभा सदस्य मनोनीत होने के बाद गाेगोई ने अपने पहले भाषण में सोमवार को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (संशोधन) विधेयक 2023 का समर्थन करते कहा था कि बुनियादी संरचना सिद्धांत में ‘संदिग्ध न्यायशास्त्र’ है।