कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने शुक्रवार को कहा कि गुरुवार शाम हुई राज्य मंत्रिमंडल की विशेष बैठक में सामाजिक एवं शैक्षिक सर्वेक्षण रिपोर्ट (जिसे जाति जनगणना के नाम से भी जाना जाता है) का कोई विरोध नहीं हुआ। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बैठक में मंत्री न ही आपस में तेज आवाज में बोले और न ही कोई बहस हुई।
सिद्धारमैया ने कहा, कल मंत्रिमंडल में रिपोर्ट पर चर्चा हुई थी। रिपोर्ट पूरी नहीं थी, इसलिए इसे अगली बैठक तक के लिए टाल दिया गया है। किसी ने इसका विरोध नहीं किया। पत्रकारों से बातचीत के दौरान उन्होंने मीडिया की उन खबरों को भी खारिज किया, जिनमें कहा गया था कि कुछ मंत्री आपस में भिड़ गए थे।
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वहीं, उप मुख्यमंत्री डी.के.शिवकुमार ने भी कहा कि बैठक में कोई बहस या ऊंची आवाज में बातचीत नहीं हुई। उन्होंने कहा, हमने बस अपनी राय साझा की। न कोई बहस हुई, न किसी ने ऊंची आवाज में बात की। बस, सुझाव दिए। इसके अलावा, कुछ भी तय नहीं हुआ है।
राज्य के कानून मंत्री एच.के.पाटिल ने बताया कि बैठक में इस बात पर चर्चा हुई कि सर्वेक्षण के लिए कौन-कौन से मापदंड इस्तेमाल किए गए। मंत्रियों ने तकनीकी जानकारी और विवरण मांगा है और मंत्रिमंडल की अगली बैठक दो मई को होगी, जिसमें इस पर फैसला किया जाएगा।
विवाद क्या है?
सूत्रों के मुताबिक, कुछ मंत्रियों ने रिपोर्ट को लेकर चिंता जताई थी। उनका कहना था कि यह रिपोर्ट अवैज्ञानिक और पुरानी है और सही गणना नहीं हुई है। इसके बाद मुख्यमंत्री ने सभी मंत्रियों से कहा कि वे अपनी राय लिखित या मौखिक रूप में दें। हालांकि कुछ खबरों में कहा गया कि कुछ मंत्री थोड़े नाराज थे। हालांकि, कई मंत्रियों ने इस बात को खारिज किया और कहा कि बैठक शांतिपूर्ण तरीके से हुई।
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किन समुदायों ने विरोध किया?
कर्नाटक की दो बड़ी जातियां (वोक्कालिगाऔर वीरशैव-लिंगायत) इस सर्वे रिपोर्ट का विरोध कर रही हैं। उनका कहना है कि यह गलत तरीके से किया गया है और सरकार को इसे रद्द कर नया सर्वे करना चाहिए।
कौन समर्थन में है?
दलित, कुछ ओबीसी और अन्य वर्गों के नेताओं ने इस रिपोर्ट का समर्थन किया है। उनका कहना है कि सरकार ने इस सर्वे पर 160 करोड़ रुपये खर्च किए हैं, तो इसे सार्वजनिक किया जाए और आगे की प्रक्रिया शुरू की जाए।
सरकार के लिए चुनौती
अब यह रिपोर्ट सरकार के लिए राजनीतिक चुनौती बन गई है। एक तरफ दो बड़ी जातियां इसके विरोध में हैं, तो दूसरी तरफ दलित और ओबीसी वर्ग इसे लागू करवाना चाहते हैं। इससे आने वाले दिनों में सरकार को दोनों तरफ से दबाव का सामना करना पड़ सकता है।