देश के सबसे बड़े अर्धसैनिक बल सीआरपीएफ के जवानों को मनपसंद खाना नहीं मिल पा रहा है। सुबह नाश्ते में पहले छोले भटूरे, कभी हलवा व डोसा उत्पम तो डिनर में मटर-पनीर मिलता था। रोजाना कुछ न कुछ अलग बनता था। 45 साल की आयु पार कर चुके कर्मियों के लिए तो अब डिनर सातों दिन एक जैसा ही बन रहा है। बदलती है तो बस सब्जी।
दूर-दराज के इलाके, जंगल या पहाड़ पर तैनात बल कर्मी, जिनके लिए लजीज भोजन केवल पेट भरने का साधन ही नहीं, बल्कि मनोरंजन की तरह होता है, वे सबसे अधिक परेशान हैं। जवानों का कहना है कि वे पैसा भी देते हैं, लेकिन खाना उनके मिजाज का नहीं होता।
पहले नाश्ते में नमकीन-मीठा सब होता था
सीआरपीएफ के सूत्र बताते हैं कि भोजन की यह नई व्यवस्था कुछ दिन पहले ही लागू हुई है। पहले जो मेन्यू था, उसके तहत जवानों को लजीज नाश्ता मिलता था। कभी छोले-भटूरे तो कभी हलवा। इसके अलावा कई अन्य पकवान भी सूची में होते थे। ऐसे ही लंच और डिनर में होता था। चावल की खीर या फिर सेंवई खाने को मिलती थी।
अब क्या-क्या मिल रहा है
नए मेन्यू के अनुसार अब जवानों, खासतौर पर 45 साल से ऊपर की आयु वालों को नाश्ते में भिगोया हुआ चना आदि मिलता है। कभी उत्पम और डोसा भी परोस देते हैं। डिनर की बात करें तो चावल, दाल, रोटी और थोड़ी बहुत सलाद मिलती है। इसके अतिरिक्त थोड़े समय के अंतराल पर सूजी की खीर भी दे देते हैं। मटर पनीर रात के मेन्यू से गायब हो चुका है।
मनपसंद खाने का ऑर्डर भी नहीं दे सकते
सिपाही से लेकर इंस्पेक्टर तक, इनके लिए सीआरपीएफ मुख्यालय द्वारा जारी आदेशों के अनुसार ही खाना बनेगा। इनसे ऊपर के पदों के लिए कोई बंदिश नहीं है। पहले जो मैस कमेटी होती थी, वह जवानों के स्वाद और उनके राज्य के पारंपरिक पकवान को भी ध्यान में रखती थी। जवान अपनी मन-पसंद का खाना बनवा सकता था। अब वह सुविधा बंद हो गई है। जवानों को खाने के लिए हर माह करीब तीन हजार रुपये देने पड़ते हैं।