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मटर-पनीर का डिनर और छोले-भटूरे-हलवे का नाश्ता बंद, परेशान है सीआरपीएफ

Thu, 02 Aug 2018 12:07 PM IST
जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली
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सैन्य दलों का भोजन - फोटो : फाइल फोटो
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देश के सबसे बड़े अर्धसैनिक बल सीआरपीएफ के जवानों को मनपसंद खाना नहीं मिल पा रहा है। सुबह नाश्ते में पहले छोले भटूरे, कभी हलवा व डोसा उत्पम तो डिनर में मटर-पनीर मिलता था। रोजाना कुछ न कुछ अलग बनता था। 45 साल की आयु पार कर चुके कर्मियों के लिए तो अब डिनर सातों दिन एक जैसा ही बन रहा है। बदलती है तो बस सब्जी।
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दूर-दराज के इलाके, जंगल या पहाड़ पर तैनात बल कर्मी, जिनके लिए लजीज भोजन केवल पेट भरने का साधन ही नहीं, बल्कि मनोरंजन की तरह होता है, वे सबसे अधिक परेशान हैं। जवानों का कहना है कि वे पैसा भी देते हैं, लेकिन खाना उनके मिजाज का नहीं होता।

पहले नाश्ते में नमकीन-मीठा सब होता था
सीआरपीएफ के सूत्र बताते हैं कि भोजन की यह नई व्यवस्था कुछ दिन पहले ही लागू हुई है। पहले जो मेन्यू था, उसके तहत जवानों को लजीज नाश्ता मिलता था। कभी छोले-भटूरे तो कभी हलवा। इसके अलावा कई अन्य पकवान भी सूची में होते थे। ऐसे ही लंच और डिनर में होता था। चावल की खीर या फिर सेंवई खाने को मिलती थी।
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अब क्या-क्या मिल रहा है
नए मेन्यू के अनुसार अब जवानों, खासतौर पर 45 साल से ऊपर की आयु वालों को नाश्ते में भिगोया हुआ चना आदि मिलता है। कभी उत्पम और डोसा भी परोस देते हैं। डिनर की बात करें तो चावल, दाल, रोटी और थोड़ी बहुत सलाद मिलती है। इसके अतिरिक्त थोड़े समय के अंतराल पर सूजी की खीर भी दे देते हैं। मटर पनीर रात के मेन्यू से गायब हो चुका है।

मनपसंद खाने का ऑर्डर भी नहीं दे सकते
सिपाही से लेकर इंस्पेक्टर तक, इनके लिए सीआरपीएफ मुख्यालय द्वारा जारी आदेशों के अनुसार ही खाना बनेगा। इनसे ऊपर के पदों के लिए कोई बंदिश नहीं है। पहले जो मैस कमेटी होती थी, वह जवानों के स्वाद और उनके राज्य के पारंपरिक पकवान को भी ध्यान में रखती थी। जवान अपनी मन-पसंद का खाना बनवा सकता था। अब वह सुविधा बंद हो गई है। जवानों को खाने के लिए हर माह करीब तीन हजार रुपये देने पड़ते हैं।
 
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अगर जो मोटे पेट की बात करें तो राजपत्रित अधिकारियों के ही ज़्यादा देखने को मिलते हैं
सीआरपीएफ कर्मियों का कहना है कि यह नई व्यवस्था सभी के लिए नहीं है।राजपत्रित अधिकारी इसमें शामिल नहीं है, जबकि इनका शरीर ही सबसे अधिक ढीला ढाला रहता है। पेट भी इन्हीं का ज्यादा निकला होता है, लेकिन ये सब कुछ खा सकते हैं। जवानों का कहना है कि यह मेन्यू तय करने से पहले उनकी राय भी ले ली जाती तो बेहतर होता। हमारे ऊपर यह मेन्यू थोप दिया गया है, जबकि इसे लेकर बल कर्मियों को प्रोत्साहन भी दिया जा सकता था।

सीआरपीएफ में बीमारी से कहीं अधिक मौतें हो रही हैं
गृह राज्यमंत्री हंसराज गंगाराम अहीर ने पिछले साल लोकसभा में एक सवाल के जवाब में बताया था कि सीआरपीएफ में आतंकी या नक्सली हमले की तुलना में कई गुना ज्यादा कर्मी बीमारियों की वजह से मर रहे हैं। अगर दो साल का आंकड़ा देखें तो आतंकी हमलों में 74 जवान या अधिकारी मारे गए थे। इसी अवधि में 1196 कर्मी किसी न किसी बीमारी के चलते अपनी जान से हाथ धो बैठे। इनमें 219 ऐसे केस थे, जिनमें हार्टअटैक की वजह से जवानों की मौत हो गई थी। 77 जवान अवसाद और 20 जवान मलेरिया के कारण मारे गए।

क्या कहना है स्पेशल डीजी का
स्पेशल डीजी (मुख्यालय) आरपी सिंह का कहना है कि जवानों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर नया मेन्यू तैयार किया गया था। इसमें बाकायदा चिकित्सकों की भी सलाह ली गई है। हमारे जवान गलत खानपान के चलते हार्टअटैक जैसी बीमारियों का शिकार हो रहे थे। देखने में आया था कि पहले जवान तला हुआ भोजन ज्यादा करते थे। कई बार जवान तय मात्रा से कहीं अधिक नॉनवेज खा लेते थे।
भागदौड़ करने के लिए उनके पास न समय और न ही जगह होती थी।

हैवी डाइट लेने के बाद जवान या तो ड्यूटी पर खड़ा रहता या फिर सो जाता था। अगर वह भागदौड़ करना भी चाहे तो भी नहीं कर सकता था। वजह, वह इलाका ही ऐसा होता है कि जरा भी अपनी टीम से इधर उधर हुए, कहीं से कोई गोली आ जाती थी। उत्तरपूर्व, नक्सल इलाके या कश्मीर, ऐसी जगहों पर जवानों के लिए दौड़भाग करना बहुत जोखिम भरा रहता है।
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